आज 2 बड़े मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
पहला, गोल्ड और सिल्वर में जो भारी दबाव देखने को मिल रहा है, क्या वह दबाव आगे भी बना रहेगा या यहां से रिवर्सल देखने को मिलेगा?
दूसरा, आईटी सेक्टर में जो तेज गिरावट आई है, क्या एआई के कारण भारतीय आईटी कंपनियों का भविष्य खतरे में है?
GOLD:
गोल्ड इस समय दबाव में दिखाई दे रहा है। बाजार में जो बिकवाली देखने को मिली है, उसका सबसे बड़ा कारण फेड से जुड़े बयान हैं। बाजार हमेशा वर्तमान को नहीं बल्कि भविष्य को कीमतों में शामिल करता है। इसलिए जैसे ही निवेशकों को लगा कि आगे चलकर बॉन्ड मार्केट मजबूत हो सकता है और ब्याज दरों को लेकर सख्ती का माहौल रह सकता है, गोल्ड में बिकवाली बढ़ गई।
अब अगर हम एक महीने का प्रदर्शन देखें तो गोल्ड में लगभग 13 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दिखाई दे रही है। यानी पिछले 30 दिनों में गोल्ड ने निवेशकों को कोई रिटर्न नहीं दिया, बल्कि पूंजी में कमी दिखाई है। अगर छह महीने का रिटर्न देखें तो करीब 3.4 प्रतिशत की कमजोरी दिखाई देती है। यह दिलचस्प बात है क्योंकि इन छह महीनों में दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध की खबरें, आर्थिक अनिश्चितता और कई बड़े घटनाक्रम हुए, लेकिन उसके बावजूद गोल्ड निवेशकों को संतोषजनक रिटर्न नहीं दे पाया।
अब यहां सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
कारण सीधा है। बाजार को लग रहा है कि भविष्य में डॉलर मजबूत रह सकता है और बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न निवेशकों को आकर्षित कर सकता है। इसलिए अल्पकाल में पैसा गोल्ड से निकलकर दूसरी परिसंपत्तियों में जा रहा है। अब तकनीकी स्तर पर देखें तो 4155 का क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण है। यह वही स्तर है जहां गोल्ड पहले भी कई बार सपोर्ट लेकर ऊपर गया है। लेकिन जब कोई सपोर्ट बार-बार टेस्ट होता है तो उस पर दबाव बढ़ता जाता है। इसलिए सोमवार को बाजार खुलने के बाद सबसे ज्यादा नजर इसी स्तर पर रहेगी। अगर गोल्ड 4155 के नीचे टिकता है और 4000 के नीचे जाकर बंद होता है, तो नीचे के स्तर भी खुल सकते हैं। लेकिन अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
दूसरी तरफ कुछ ऐसे फैक्टर हैं जो अभी भी गोल्ड के पक्ष में दिखाई देते हैं। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लगातार गोल्ड खरीद रहे हैं। वैश्विक कर्ज लगातार बढ़ रहा है। मुद्रास्फीति पूरी तरह नियंत्रित नहीं हुई है और आर्थिक अनिश्चितता अभी खत्म नहीं हुई है। यानी लंबी अवधि की कहानी अभी भी गोल्ड के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।
अब मूविंग एवरेज की बात कर लेते हैं। 200 डे मूविंग एवरेज लगभग 4360 के आसपास है। 50 डे मूविंग एवरेज लगभग 4540 के आसपास है। 20 डे मूविंग एवरेज लगभग 4370 के आसपास है। इस समय कीमत इन महत्वपूर्ण स्तरों के नीचे दबाव में दिखाई दे रही है।
लेकिन इतिहास बताता है कि जब कीमतें प्रमुख मूविंग एवरेज के नीचे जाकर अत्यधिक दबाव में आती हैं, तो कई बार वहीं से बड़ा रिवर्सल भी शुरू होता है। गोल्ड-सिल्वर का जो भी बुल मार्केट है, वह खत्म नहीं हुआ है। 1975 में गोल्ड लगभग 50% गिर गया था और उसके बाद फिर बाउंस बैक किया था। इसके बाद 9 साल के अंदर लगभग 2400% की तेजी देखने को मिली थी। कोई बुल मार्केट खत्म नहीं हुआ है। लेकिन इस समय प्रेशर ज़ोन है। चूंकि अमेरिका का कर्ज कोई खत्म नहीं होने वाला है।
दूसरी बात, गोल्ड का बुल मार्केट कब खत्म होता है? जब लंबे समय के लिए ब्याज दरों को ऊंचा करके रखा जाता है। जैसा कि 1980 में फेड चेयरमैन वॉल्कर ने किया था। उन्होंने ब्याज दरों को काफी ऊंचा रखा और कई सालों तक ऊंचा बनाए रखा, जिसके कारण गोल्ड लगभग 20 साल तक बढ़ा ही नहीं। वह 850 डॉलर से गिरकर लगभग 250 डॉलर के आसपास आ गया था। उस समय की अर्थव्यवस्था कुछ और थी। इस समय दुनिया भारी कर्ज के दबाव में है। दूसरा, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना भी मुश्किल है। यानी गिरावट और अवसर दोनों साथ-साथ मौजूद हैं।
अब बात सिल्वर की:
सिल्वर में कमजोरी गोल्ड की तुलना में ज्यादा दिखाई दे रही है। पिछले एक महीने में सिल्वर लगभग 3 प्रतिशत नीचे है। अगर छह महीने का प्रदर्शन देखें तो करीब 3.4 प्रतिशत की कमजोरी दिखाई देती है। यानी सिल्वर ने भी पिछले छह महीनों में निवेशकों को कोई खास रिटर्न नहीं दिया है।
अब तकनीकी स्थिति देखें तो 200 डे मूविंग एवरेज लगभग 67.66 के आसपास है। 50 डे मूविंग एवरेज 73.37 के आसपास है। 20 डे मूविंग एवरेज लगभग 70.53 के आसपास है।
सिल्वर अपने महत्वपूर्ण औसतों के नीचे दिखाई दे रहा है। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण स्तर 61 डॉलर का है। चार बार बाजार इस स्तर से उछल चुका है। अब पांचवीं बार इसकी परीक्षा होने वाली है। अगर यह स्तर बचता है तो तेज बाउंस बैक देखने को मिल सकता है। लेकिन अगर यह स्तर टूटता है तो नीचे के स्तरों की ओर रास्ता खुल सकता है। इस समय रिटेल निवेशक सिल्वर बेच रहे हैं, जबकि इंडस्ट्रियल डिमांड और रिफाइनरी की मांग अभी भी बनी हुई है। यानी मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन सप्लाई बढ़ गई है। इसी वजह से कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
अब गोल्ड-सिल्वर रेशियो की बात करें तो यह लगभग 1:64 के आसपास है। इसका मतलब यह है कि सिल्वर, गोल्ड की तुलना में ज्यादा कमजोर प्रदर्शन कर रहा है। जब यह अनुपात बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तब कई निवेशक सिल्वर को तुलनात्मक रूप से सस्ता मानने लगते हैं। हालांकि सिर्फ इस आधार पर निवेश का निर्णय लेना सही नहीं होगा।
अब डॉलर इंडेक्स पर नजर डालते हैं। डॉलर इंडेक्स लगभग 100.76 के आसपास बना हुआ है। हालांकि इसमें कुछ नरमी दिखाई दी है, लेकिन अभी भी यह मजबूत स्थिति में है। और जब तक डॉलर मजबूत रहेगा, तब तक गोल्ड और सिल्वर पर दबाव बना रह सकता है।
बात बॉन्ड मार्केट की:
30 साल की यील्ड लगभग 4.90 प्रतिशत है। 10 साल की यील्ड लगभग 4.55 प्रतिशत है। लेकिन सबसे ज्यादा असर 2 साल की यील्ड डाल रही है। यही वह क्षेत्र है जहां शॉर्ट टर्म पैसा आकर्षित हो रहा है। यानी निवेशक फिलहाल सुरक्षित रिटर्न की तलाश में दिखाई दे रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहेगी? यही वह प्रश्न है जिस पर बाजार आने वाले महीनों में फैसला करेगा। अगर आर्थिक स्थिति फेड की योजनाओं को पूरी तरह समर्थन नहीं देती, तो गोल्ड और सिल्वर में फिर से मजबूती लौट सकती है। लेकिन फिलहाल बाजार सावधानी के मोड में दिखाई दे रहा है।
अब बात भारतीय शेयर बाजार की।
कल हमारे बाजार में मुनाफावसूली देखने को मिली। निफ्टी लगभग 154 अंक नीचे बंद हुआ। हालांकि सबसे सकारात्मक बात यह रही कि बाजार 24,000 के ऊपर बंद होने में सफल रहा। यह एक मनोवैज्ञानिक स्तर है। पिछले चार-पांच दिनों से लगातार खरीदारी चल रही थी। ऐसी स्थिति में थोड़ी-बहुत प्रॉफिट बुकिंग होना बिल्कुल सामान्य बात है।
जिस चीज ने बाजार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह था आईटी सेक्टर। आईटी इंडेक्स में लगभग 3.5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली। टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और दूसरी बड़ी कंपनियों में दबाव दिखाई दिया। अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई? इसकी शुरुआत हुई एक वैश्विक आईटी कंपनी की रिपोर्ट से। बाजार ने उस रिपोर्ट के आउटलुक को नकारात्मक तरीके से लिया। हालांकि राजस्व वृद्धि, ऑपरेटिंग मार्जिन और कैश फ्लो में कोई बड़ी कमजोरी नहीं थी। लेकिन बाजार हमेशा अगले छह महीने और अगले एक साल की कहानी देखता है और वहां उसे कुछ धीमापन दिखाई दिया। यहीं से बिकवाली शुरू हुई।
अब असली सवाल यह है कि क्या भारतीय आईटी सेक्टर खतरे में है? क्या एआई आने के बाद आईटी कंपनियों का बिजनेस खत्म हो जाएगा?
मेरे हिसाब से बाजार इस समय थोड़ा ज्यादा डर रहा है। जब भी नई तकनीक आती है तो शुरुआत में यही डर पैदा होता है कि पुरानी नौकरियां खत्म हो जाएंगी। ऐसा कंप्यूटर आने पर भी कहा गया था। ऐसा इंटरनेट आने पर भी कहा गया था। लेकिन हुआ क्या? पुरानी नौकरियों की जगह नई नौकरियां पैदा हुईं और कुल मिलाकर टेक्नोलॉजी सेक्टर और बड़ा हो गया। एआई के साथ भी कुछ वैसा ही दिखाई देता है। आज एआई को चलाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, डेटा सेंटर चाहिए, साइबर सिक्योरिटी चाहिए, मेंटेनेंस चाहिए। इन सभी क्षेत्रों में आईटी कंपनियों की जरूरत बनी रहेगी। यही वजह है कि दुनिया की कई बड़ी आईटी कंपनियां खुद कह रही हैं कि एआई उनके लिए सिर्फ खतरा नहीं बल्कि अवसर भी है।
टीसीएस भारत की सबसे बड़ी आईटी सेवा कंपनी है। कंपनी लगातार एआई आधारित समाधान विकसित कर रही है। बाजार में गिरावट आई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कंपनी का बिजनेस मॉडल खत्म हो गया। इसी तरह इंफोसिस की भी स्थिति है। इंफोसिस का अमेरिकी बाजार में बड़ा एक्सपोजर है। इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति का असर इस पर ज्यादा दिखाई देता है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि कंपनी की आय अचानक समाप्त होने वाली है। हां, ग्रोथ की रफ्तार कम हो सकती है, वैल्यूएशन और नीचे आ सकते हैं। लेकिन यह कहना कि पूरा सेक्टर खत्म हो जाएगा, अभी तथ्यों से मेल नहीं खाता।
किसी भी शेयर से भावनात्मक लगाव नहीं होना चाहिए। शेयर आपका दोस्त नहीं है। शेयर आपका रिश्तेदार नहीं है। शेयर का काम सिर्फ एक है — आपको उचित रिटर्न देना। अगर कोई कंपनी लंबे समय तक आपके लक्ष्य के अनुसार रिटर्न नहीं दे रही है, तो आपको समय-समय पर अपने निवेश की समीक्षा करनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हर गिरावट में बेच देना है। लेकिन यह जरूर देखना चाहिए कि जिस कारण से आपने निवेश किया था, वह कारण आज भी मौजूद है या नहीं।
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