कर्नाटक: बागलकोट जिला अपने ऐतिहासिक गौरव और प्राचीन वास्तुकला के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. इसी जिले के एक छोटे से शांत गांव में स्थित है महाकूट मंदिर समूह. इसे स्थानीय लोग और श्रद्धालु श्रद्धा से दक्षिण काशी भी कहते हैं. हरी-भरी पहाड़ियों और घने पेड़ों के बीच छिपा यह मंदिर परिसर सिर्फ अपनी धार्मिक आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला और जल इंजीनियरिंग के एक ऐसे अनोखे रहस्य के लिए प्रसिद्ध है, जिसे देखकर आधुनिक इंजीनियर भी हैरान रह जाते हैं.
चालुक्य राजवंश का गौरवशाली इतिहास
इस भव्य मंदिर समूह का निर्माण छठी और सातवीं शताब्दी ईस्वी के दौरान बादामी के प्रतापी चालुक्य राजवंश के शुरुआती राजाओं द्वारा करवाया गया था. इतिहासकार बताते हैं कि चालुक्य राजा जब भी किसी युद्ध को जीतकर लौटते थे, तो वे इस पवित्र शैव मठ में महादेव का आभार प्रकट करने आते थे. राजाओं ने इस परिसर को भव्य रूप देने के लिए बड़ी मात्रा में सोना, भूमि और धन दान किया था. यहां के मंदिरों में आपको द्रविड़ और नागर स्थापत्य शैलियों का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है, जिसने आगे चलकर दक्षिण भारत की प्रसिद्ध वेसर शैली को जन्म दिया. पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वही पावन भूमि है जहां अगस्त्य ऋषि ने वातापी और इल्वल नाम के भयंकर असुरों का संहार किया था. शिव की ऊर्जा और पानी की बेचैनी का रहस्यशास्त्रों में वर्णन है कि महादेव जब शांत होते हैं तो वो ध्यानमग्न रहते हैं, लेकिन जब उनके भीतर की ऊर्जा चरम पर होती है, तो उसे संभालना सृष्टि के लिए कठिन हो जाता है. महाकूट का यह स्थान शिव की उसी प्रचंड ऊर्जा और प्रकृति के बीच के संतुलन को दर्शाता है. मंदिर परिसर के पीछे की पहाड़ियों से एक रहस्यमयी, बारहमासी प्राकृतिक झरना लगातार बहता रहता है. चालुक्य राजाओं और वास्तुकारों ने इस पानी को सहेजने के लिए पत्थरों को काटकर एक अद्भुत जलकुंड बनाया, जिसे विष्णु पुष्करिणी कहा जाता है. इस कुंड का पानी कभी नहीं सूखता, मानो प्रकृति स्वयं सदियों से महादेव के ताप को शांत करने की बेचैनी में अनवरत जल अर्पित कर रही हो.
पानी के नीचे का चमत्कारी चैंबर
इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण और रहस्य इसी विष्णु पुष्करिणी कुंड के बिल्कुल नीचे छिपा हुआ है. कुंड के ठंडे और कांच जैसे साफ पानी की तलहटी में पत्थरों को तराशकर एक छोटा सा गुप्त कमरा बनाया गया है. इस अंधेरे सीक्रेट चैंबर के भीतर स्थापित हैं साक्षात पंचमुख शिव लिंग. पहाड़ियों से आने वाला शुद्ध जल हमेशा इस गुप्त चैंबर से होकर ही बाहर निकलता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो महादेव सदियों से जलसमाधि में लीन हैं और यह जल उनका निरंतर प्राकृतिक जलाभिषेक कर रहा है. क्या पानी के नीचे जाना सुरक्षित है? पहली बार देखने पर किसी भी श्रद्धालु के मन में यह कौतूहल और डर आना स्वाभाविक है कि क्या इतने संकरे और पानी से भरे रास्ते के अंदर जाना सुरक्षित है? क्या यहां कोई डूबता तो नहीं? लेकिन असलियत बेहद रोमांचक और सुरक्षित है. विष्णु पुष्करिणी कुंड का पानी इतना क्रिस्टल क्लियर है कि आप ऊपर खड़े होकर भी नीचे की सतह को साफ देख सकते हैं. जो लोग तैरना जानते हैं, वे एक गहरी सांस लेकर, पानी के नीचे मात्र 2 से 3 सेकंड की डुबकी लगाते हैं और पत्थरों के संकरे रास्ते से होकर सीधे उस गुप्त चैंबर में पहुंच जाते हैं. पानी कम गहरा होने और अत्यधिक साफ होने के कारण आज तक यहां कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है. जो लोग पानी के नीचे नहीं जा सकते, वे कुंड के ठीक बीच में एक ऊंचे मंच पर स्थापित दुर्लभ चतुर्मुख लिंग का दर्शन बाहर से ही कर सकते हैं.
महाकूट मंदिर कैसे पहुंचें?
महाकूट मंदिर पहुंचना बेहद आसान है. यह प्रसिद्ध यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट बादामी से मात्र 13 से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बादामी है, जो देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है. बादामी पहुंचने के बाद आप वहां से स्थानीय ऑटो, टैक्सी या स्कूटी किराए पर ले सकते हैं. खूबसूरत ग्रामीण रास्तों और खेतों के बीच से गुजरते हुए आप मात्र 25 से 30 मिनट में महाकूट मंदिर परिसर पहुंच जाएंगे. अगर आप इतिहास, रोमांच और गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा को एक साथ महसूस करना चाहते हैं, तो कर्नाटक के इस प्राचीन अंडरवाटर शिव लिंग के दर्शन करने एक बार जरूर आएं.




