भारतीय संस्कृति में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार और सर्वशक्तिमान माना गया है। लेकिन जब-जब उन्होंने धरती पर अवतार लिया, चाहे वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों या योगेश्वर कृष्ण, उन्हें भी अपनों से बिछड़ने और वियोग की वैसी ही पीड़ा झेलनी पड़ी जैसी एक साधारण मनुष्य झेलता है। आखिर ऐसा क्यों? क्यों सीता और राधा से वियोग के समय ईश्वर की आंखों में भी आंसू थे? पौराणिक ग्रंथों के विश्लेषण से इसके पीछे दो प्रमुख ‘इनसाइड स्टोरीज’ निकलकर आती हैं।
महर्षि भृगु का क्रोध और ‘पत्नी वियोग’ का दंड
पहली कथा का संबंध महर्षि भृगु से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय असुरों और देवताओं के युद्ध के दौरान असुरों को बचाने के लिए शुक्रचार्य की माता (महर्षि भृगु की पत्नी) ने अपनी तपस्या की शक्ति से देवताओं को असहाय कर दिया था। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु को विवश होकर भृगु ऋषि की पत्नी का वध करना पड़ा।जब महर्षि भृगु को इस बात का पता चला, तो उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर विष्णु जी को श्राप दिया— जिस प्रकार आज मैं अपनी निर्दोष पत्नी के वियोग में तड़प रहा हूं, उसी प्रकार आपको भी बार-बार मनुष्य रूप में जन्म लेकर अपनी पत्नी के वियोग का कष्ट सहना होगा। यही कारण था कि राम अवतार में सीता माता से उनका लंबा वियोग हुआ।
नारद मुनि का अहंकार और ‘बंदर’ का मुख
दूसरी महत्वपूर्ण वजह देवर्षि नारद का वह श्राप है, जो उन्होंने भगवान को वैकुंठ में दिया था। कथा के अनुसार, नारद मुनि को अपने ब्रह्मचर्य पर अहंकार हो गया था। उनके इस मद को तोड़ने के लिए विष्णु जी ने अपनी माया से एक सुंदर नगर और राजकुमारी विश्वमोहिनी का निर्माण किया। नारद राजकुमारी पर मोहित हो गए और उन्होंने भगवान से उनका ‘हरि रूप’ माँगा। चूंकि हरि का एक अर्थ बंदर भी होता है, इसलिए भगवान ने उन्हें बंदर का चेहरा दे दिया। स्वयंवर में नारद की भारी फजीहत हुई। अपमानित नारद ने श्राप दिया— जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए भटक रहा हूं, आप भी मनुष्य रूप में स्त्री के वियोग में व्याकुल होंगे और उस समय ये बंदर ही आपकी सहायता करेंगे। इसी कारण राम-कथा में वानर सेना की भूमिका महत्वपूर्ण बनी।
कर्म का अटल सिद्धांत
विद्वानों का मानना है कि भगवान इन श्रापों को टाल सकते थे, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से इन्हें स्वीकार किया। इसके पीछे का उद्देश्य संसार को ‘कर्म का सिद्धांत’ समझाना था। भगवान यह दिखाना चाहते थे कि यदि कोई ईश्वर होकर भी मानवीय देह धारण करता है, तो उसे प्रकृति के नियमों और कर्मफल की मर्यादा का पालन करना ही होगा। ये कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि अहंकार का विनाश निश्चित है और कर्मों का फल हर किसी को भोगना पड़ता है, चाहे वह साधारण मनुष्य हो या स्वयं भगवान।




