आज गोल्ड, सिल्वर और शेयर बाजार पर चर्चा करेंगे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गोल्ड और सिल्वर में बॉटम बन चुका है, या अभी गिरावट का दौर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है? साथ ही, दुनिया भर में एआई सेक्टर में मची उथल-पुथल का भारत के शेयर बाजार पर क्या असर पड़ सकता है?
पहले बात सिल्वर की :
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिल्वर 58.92 डॉलर पर 1.03% की तेजी के साथ बंद हुआ। इससे पहले जब सिल्वर 58.34 डॉलर के आसपास पहुंचा था, तब लगभग 19 टन की खरीदारी देखने को मिली। यह इस बात का संकेत है कि बड़े निवेशक निचले स्तरों पर खरीदारी कर रहे हैं। 53 डॉलर सिल्वर के लिए एक मजबूत सपोर्ट लेवल है। अगर यह स्तर टूटता, तो कीमतें 50 डॉलर से नीचे भी जा सकती थीं। लेकिन बाजार वहां तक नहीं पहुंचा और लगभग 55 डॉलर के आसपास से ही रिकवरी शुरू हो गई।
यह समझना जरूरी है कि बाजार कभी भी सीधी रेखा में ऊपर नहीं जाता। पहले कुछ समय तक कंसोलिडेशन होता है, फिर तेजी आती है, उसके बाद हल्का करेक्शन होता है और फिर दोबारा मजबूती देखने को मिलती है।
तकनीकी संकेतकों की बात करें तो सिल्वर का RSI पहले 27 तक पहुंच गया था, जो ओवरसोल्ड ज़ोन माना जाता है। अब यह बढ़कर 32 के आसपास आ गया है। इसका मतलब है कि फिलहाल गिरावट का सबसे बड़ा खतरा काफी हद तक टलता हुआ दिखाई दे रहा है।अगर प्रदर्शन पर नजर डालें, तो पिछले एक सप्ताह में सिल्वर लगभग 9%, पिछले एक महीने में करीब 23% और पिछले छह महीनों में लगभग 18% गिरा है। सिल्वर अभी भी अपने ऑल टाइम हाई से लगभग 53% नीचे कारोबार कर रहा है।
गोल्ड :
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड 4072 डॉलर पर लगभग 1% की तेजी के साथ बंद हुआ। 4030 डॉलर के आसपास करीब 6.90 मीट्रिक टन की बड़ी डिलीवरी हुई, जो यह संकेत देती है कि इस स्तर पर बड़े निवेशकों ने अच्छी खरीदारी की है। कुछ समय पहले तक ऐसा लग रहा था कि गोल्ड 3800 डॉलर तक जा सकता है। लेकिन अमेरिका में महंगाई के अपेक्षा से अधिक आने वाले आंकड़ों ने पूरी तस्वीर बदल दी। महंगाई बढ़ने के बाद डॉलर कमजोर हुआ, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट आई और इन दोनों कारणों से गोल्ड को मजबूत समर्थन मिला। दो वर्षीय, दस वर्षीय और तीस वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट दर्ज की गई। साथ ही डॉलर इंडेक्स भी कमजोर हुआ। ये दोनों संकेत गोल्ड के लिए सकारात्मक माने जाते हैं।
गोल्ड का RSI लगभग 37 पर पहुंच गया है। पिछले एक सप्ताह में गोल्ड केवल 2% गिरा, जबकि इसी अवधि में सिल्वर 9% टूटा। इससे साफ है कि गिरावट के दौरान गोल्ड ने अपेक्षाकृत अधिक मजबूती दिखाई।
गोल्ड-सिल्वर रेशियो 70 के आसपास पहुंच गया था। तकनीकी चार्ट पर Gravestone Doji कैंडल बनी है, जिसे आमतौर पर संभावित रिवर्सल का संकेत माना जाता है। इससे ऐसा लगता है कि गोल्ड और सिल्वर दोनों में बनने वाला बॉटम लगभग पूरा हो चुका है।
हालांकि एक-दो बार हल्की गिरावट या फ्लैश क्रैश देखने को मिल सकता है, लेकिन फिलहाल 50 डॉलर से नीचे सिल्वर और 3600 डॉलर से नीचे गोल्ड जाने की संभावना पहले की तुलना में काफी कम दिखाई दे रही है। वहीं 3900 डॉलर का स्तर गोल्ड के लिए एक मजबूत सपोर्ट माना जा रहा है।
चीन से सकारात्मक संकेत
पिछले कुछ समय में चीन ने बाजार से बड़ी मात्रा में नकदी निकाल ली थी, जिससे गोल्ड और सिल्वर की मांग प्रभावित हुई थी। लेकिन अब चीन फिर से बाजार में लिक्विडिटी बढ़ा रहा है। रिवर्स रेपो ऑपरेशन तेज किए जा रहे हैं और जुलाई से हांगकांग में नया गोल्ड क्लियरिंग सिस्टम भी शुरू होने जा रहा है। इन दोनों कदमों से आने वाले समय में गोल्ड और सिल्वर को मजबूती मिलने की संभावना बढ़ गई है।
जापान की चुनौती
जापान इस समय गंभीर आर्थिक दबाव में है। उसका सरकारी कर्ज जीडीपी के लगभग 250% तक पहुंच चुका है और जापानी येन लगातार कमजोर होती जा रही है। यदि जापान अपनी आर्थिक स्थिति संभालने के लिए अमेरिकी बॉन्ड बेचता है, तो अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में निवेशकों का रुझान गोल्ड की ओर बढ़ सकता है।
दुनिया भर में एआई कंपनियों में भारी निवेश हुआ, लेकिन अब इस सेक्टर में दबाव साफ दिखाई देने लगा है। दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में तेज गिरावट आई है। Samsung और SK Hynix जैसे प्रमुख टेक शेयरों में भी भारी बिकवाली देखने को मिली। अब आशंका जताई जा रही है कि यही दबाव आगे ताइवान और अमेरिका के टेक सेक्टर तक भी पहुंच सकता है। Apple सहित कई बड़ी टेक कंपनियों के शेयर भी दबाव में हैं। बाजार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि एआई पर जितना निवेश किया जा रहा है, उसके मुकाबले अभी तक उतनी कमाई नहीं हो रही है।
भारत की स्थिति दुनिया के कई अन्य देशों से अलग है। भारतीय शेयर बाजार का एआई सेक्टर पर उतना सीधा निर्भरता नहीं है, जितना अमेरिका, दक्षिण कोरिया या ताइवान का है।यदि एआई सेक्टर का बुलबुला धीरे-धीरे फूटता है, तो भारतीय बाजार पर उसका असर अपेक्षाकृत कम पड़ सकता है।साथ ही, पिछले दो वर्षों में भारतीय बाजार का वैल्यूएशन काफी हद तक संतुलित हो चुका है, जिससे आगे की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई देती है।
हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट आई है। ब्रेंट और WTI दोनों क्रूड ऑयल में लगभग 4% की गिरावट दर्ज की गई। भारत के लिए सस्ता कच्चा तेल हमेशा सकारात्मक माना जाता है, क्योंकि इससे महंगाई नियंत्रित रहती है और आर्थिक विकास को समर्थन मिलता है।इसी बीच Goldman Sachs ने भी भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान बढ़ाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत का मजबूत घरेलू उपभोग बताया गया है।
कुल मिलाकर बाजार की तस्वीर पहले की तुलना में काफी बेहतर दिखाई दे रही है। गोल्ड और सिल्वर में घबराने की आवश्यकता नहीं है। लंबी अवधि का रुझान अभी भी सकारात्मक नजर आता है। वहीं भारतीय शेयर बाजार भी वैश्विक चुनौतियों के बीच अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है।निवेशकों को धैर्य रखना चाहिए और छोटी अवधि की हलचल से प्रभावित होकर जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए।
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