सत्ता जाते ही दीदी के हाथ से पार्टी भी गई! TMC में बड़ी टूट का दावा, क्या ममता बनर्जी का होगा उद्धव ठाकरे वाला हाल?

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में हर दिन नया विवाद सामने आ रहा है।एक तरफ ममता दीदी अपने नेताओं पर हुए हमलों के खिलाफ सड़क पर धरना देने पर अड़ी हुई हैं, तो दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के दो निष्कासित विधायक कई विधायकों के साथ बैठक करते दिखे।पार्टी से निकाले गए विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी सोमवार देर शाम विधायक हॉस्टल पहुंचे, जहां दोनों ने टीएमसी के कई विधायकों के साथ बैठक की।पार्टी से निकाले गए नेता रिजू दत्ता ने दावा किया कि 80 में से 50 से ज्यादा विधायक खुद को असली तृणमूल बताने की तैयारी कर रहे हैं।रिजू ने दावा किया है कि आज ये सभी विधायक विधानसभा स्पीकर के पास जाएंगे और तीन मुद्दे उठाएंगे।

पहला – हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं।

दूसरा – विपक्ष के नेता ऋतब्रत होंगे, न कि शोभनदेव।

तीसरा – हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है, इसलिए चुनाव चिह्न हमारा होना चाहिए।

जिसके बाद से अटकलें लगा जा रही है कि TMC का हाल भी महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना जैसा होने वाला है, हालांकि यहां बीजेपी को जोड़-तोड़ सरकार नहीं बनानी है, जिसके चलते बीजेपी दावा कर रही है कि TMC के लिए हमारे दरवाजे बंद है, लेकिन ममता दीदी लगातार बीजेपी पर टीएमसी को तोड़ने का आरोप लगा रही हैं।

TMC टूटती है, तो क्या हो सकता है?

टीएमसी के टूटने पर दो संभवाएं बनती दिखाई दे रही है। पहली ये कि दो तिहाई विधायक भाजपा में शामिल हों यानि TMC के कुल 80 विधायकों में से दो तिहाई 54 विधायक भाजपा में शामिल होने का फैसला लेते हैं तो दलबदल कानून नहीं लगेगा।दूसरी TMC में 2 गुटों में बंट जाए। एक ग्रुप पार्टी से अलग होकर असली TMC का दावा करे। इसके लिए 54 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। अगर ऐसा होता है तो बड़े गुट के दावे पर चुनाव आयोग फैसला लेगा मामला कोर्ट भी जा सकता है।91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद चुनाव आयोग यह जांच करता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वास्तव में बीजेपी बंगाल में टीएमसी को तोड़ने की कोशिश कर रही है, या फिर चुनावी हार के बाद टीएमसी के नेता और कार्यकर्ता जांच एवं कार्रवाई के डर से खुद ही पार्टी से दूरी बना रहे हैं।जिन राज्यों में बीजेपी सत्ता में आती है, वहां विपक्ष इतना कमजोर क्यों हो जाता है? क्या विपक्षी नेता सत्ता-लोलुप हैं, या फिर बीजेपी दबाव की राजनीति के जरिए विपक्ष को कमजोर करती है?

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