मंडी (हिमाचल प्रदेश): धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में, समुद्र तल से करीब 9,000 फीट की ऊंचाई पर एक ऐसी जगह है, जहां कदम रखते ही जमीन रबर के गद्दे की तरह हिलने लगती है. मंडी जिले की यह पराशर झील न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जानी जाती है, बल्कि यह विज्ञान और आस्था का एक ऐसा संगम है, जिसे समझने में आज का आधुनिक विज्ञान भी उलझा हुआ है.
तैरता हुआ द्वीप और पृथ्वी का ‘अक्ष’
पराशर झील का सबसे बड़ा रहस्य इसके ठीक बीचों-बीच तैरता हुआ मिट्टी और घास का गोलाकार द्वीप है, जिसे स्थानीय भाषा में टहला कहा जाता है. यह द्वीप सुबह पूर्व से पश्चिम की ओर तैरता है. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस द्वीप का स्थिर होना आने वाली किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का संकेत है. हैरानी की बात यह है कि वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, यह द्वीप झील का 29% हिस्सा कवर करता है, जबकि शेष 71% पानी है. दिलचस्प विरोधाभास यह है कि हमारी पृथ्वी पर भी थल और जल का अनुपात ठीक यही (29% भूमि और 71% पानी) है. इसी कारण इसे पृथ्वी का सूक्ष्म रूप भी माना जाता है.
वह गहराई, जिसे कोई नाप नहीं पाया
पराशर झील की गहराई आज भी एक अनसुलझी पहेली है. स्थानीय लोग बताते हैं कि जब पहाड़ी तूफान में 30 मीटर ऊंचे देवदार के पेड़ झील में गिरते हैं, तो वे देखते ही देखते पानी में ऐसे समा जाते हैं कि फिर कभी दिखाई नहीं देते. राजाओं के समय से लेकर आधुनिक गोताखोरों तक, सभी ने इसकी गहराई नापने की कोशिश की, लेकिन कोई भी इसके तल तक नहीं पहुंच सका. अंततः, सुरक्षा और आस्था के चलते प्रशासन ने यहां गोताखोरी पर प्रतिबंध लगा दिया है.
विज्ञान बनाम मान्यताएं: ‘श्विंगमूर’ प्रभाव
झील के किनारे पर चलते हुए आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप किसी वाटरबेड या स्पंज पर चल रहे हैं. विज्ञान इसे क्वेकिंग बॉग (Quaking Bog) या श्विंगमूर प्रभाव कहता है. हज़ारों सालों से जमी हुई वनस्पतियों की लचीली परत के कारण जमीन स्प्रिंग की तरह काम करती है. वहीं, मंदिर के पुजारियों का कहना है कि यह स्थान ऋषि पराशर की तपस्थली है, जहां आज भी उनकी दिव्य ऊर्जा का वास है.
12 साल में बना एक पेड़ का अद्भुत मंदिर
झील के किनारे स्थित तीन मंजिला पैगोडा शैली का मंदिर अपने आप में स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है. किवदंती है कि इस विशाल मंदिर का निर्माण केवल एक ही देवदार के पेड़ की लकड़ी से किया गया था, जिसे पूरा होने में 12 साल लगे. मंदिर के गर्भगृह में ऋषि पराशर की कोई धातु की मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक पाषाण पिंडी है, जो उनके भूमि से गहरे जुड़ाव को दर्शाती है.
क्यों खास है यह यात्रा?
- धार्मिक महत्व: इसे ऋषि पराशर, पांडवों और भगवान गणेश की कथाओं से जोड़ा जाता है. यहां का सरानाहुली मेला और ऋषि पंचमी का उत्सव दुनिया भर के पर्यटकों और भक्तों को आकर्षित करता है.
- प्रकृति का नज़ारा: यहां से धौलाधार, पीर पंजाल और किन्नौर की पर्वत श्रृंखलाओं का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.
- कैसे पहुंचें: मंडी या बजौरा से बागी गांव तक सड़क मार्ग से जाया जा सकता है. आगे की 7-8 किलोमीटर की ट्रेकिंग यात्रा को और भी रोमांचक बना देती है.
- यह स्थान एक अत्यंत पवित्र और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का हिस्सा है. यहां झील के पानी को छूना या जूते पहनकर परिक्रमा करना वर्जित है. प्रकृति की इस धरोहर को बचाने के लिए प्रशासन ने वाहनों को भी निश्चित दूरी पर रोकने के कड़े निर्देश दिए हैं. यदि आप प्रकृति के अनसुलझे रहस्यों और आध्यात्मिकता की तलाश में हैं, तो पराशर झील आपके लिए एक परफेक्ट प्लेस है. यहां आकर विज्ञान घुटने टेक देता है और इंसान का सिर श्रद्धा से झुक जाता है.




