वृंदावन। भक्ति और प्रेम की नगरी वृंदावन में मंदिरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन यहां स्थित ‘श्री राधावल्लभ मंदिर’ का रहस्य और इसकी स्थापना की गाथा सबसे अनोखी है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान कृष्ण के साथ राधा रानी की कोई भौतिक मूर्ति नहीं है. आखिर इसके पीछे क्या दार्शनिक और पौराणिक कारण हैं? आइए जानते हैं इस पावन धाम का विस्मयकारी इतिहास.
शिव के हृदय का विग्रह
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर के अधिष्ठाता ‘श्री राधावल्लभ लाल जी’ का विग्रह कोई साधारण मूर्ति नहीं है. कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के देवबंद निवासी आत्मदेव नामक एक निर्धन ब्राह्मण ने महादेव शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी. जब भोलेनाथ ने वरदान मांगने को कहा, तो ब्राह्मण ने महादेव का ‘सबसे प्रिय और अमूल्य रत्न’ मांग लिया. भक्तवत्सल शिवजी संकोच में पड़ गए, क्योंकि कैलाश पर वे और माता पार्वती जिस विग्रह की युगों से अष्टयाम सेवा कर रहे थे, वे स्वयं राधावल्लभ लाल थे. अंततः महादेव ने अपने हृदय से प्रेम के साक्षात स्वरूप को प्रकट कर ब्राह्मण को सौंप दिया.
क्यों हुई थी ब्राह्मण को चिंता?
जब आत्मदेव को भगवान का विग्रह प्राप्त हुआ, तो वह खुशी के बजाय चिंता में डूब गए. उन्हें लगा कि एक निर्धन व्यक्ति के रूप में वे इस दिव्य विग्रह की इत्र सेवा, विशिष्ट भोग और सुंदर वस्त्रों का खर्च कैसे उठाएंगे? तब महादेव ने उन्हें आश्वासन दिया कि यह विग्रह नियत समय पर अपने शाश्वत सेवक के पास स्वतः पहुंच जाएगा.
गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु और ईश्वरीय विधान
वर्षों बाद, जब गोस्वामी श्री हित हरिवंश महाप्रभु (जिन्हें भगवान शिव की बांसुरी का अवतार माना जाता है) वृंदावन की यात्रा पर निकले, तो उन्हें स्वप्न में आदेश मिला. ईश्वरीय विधान के अनुसार, आत्मदेव की पुत्रियों के साथ महाप्रभु का विवाह हुआ और कन्यादान में उन्हें यही दिव्य ‘राधावल्लभ विग्रह’ प्राप्त हुआ. महाप्रभु इस विग्रह को वृंदावन ले आए और यमुना तट पर प्रतिष्ठित किया.
‘एक प्राण दो देह’: राधा रानी क्यों नहीं हैं?
श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यहां राधा रानी की प्रतिमा क्यों नहीं है? राधावल्लभ संप्रदाय का दार्शनिक आधार ‘एक प्राण दो देह’ के सिद्धांत पर टिका है. मंदिर के पुजारियों और आचार्यों के अनुसार, गर्भगृह में विराजमान विग्रह केवल श्री कृष्ण का नहीं है, बल्कि इसका आधा भाग साक्षात श्री राधा जी का है. वे प्रेम की पराकाष्ठा में पूर्णतः एकाकार हैं. राधा रानी की अदृश्य उपस्थिति को सम्मान देने के लिए विग्रह के ठीक बाईं ओर एक सुसज्जित गद्दी और स्वर्ण मुकुट स्थापित किया गया है. इसे ‘गद्दी सेवा’ कहा जाता है. मान्यता है कि राधा रानी का स्वरूप किसी भौतिक प्रतिमा की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता; वे सर्वव्यापी हैं.
वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण
इस दिव्य विग्रह के लिए संवत् 1642 (1585 ईस्वी) में एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. इसे बीरबल और अब्दुल रहीम खान-ए-खाना के सहयोगी सुंदरदास भटनागर ने बनवाया था. उस समय शाही फरमान के जरिए लाल बलुआ पत्थर का उपयोग करने की विशेष अनुमति ली गई थी, जो उस काल में केवल शाही महलों के लिए आरक्षित था. आज भी यह मंदिर अपनी दार्शनिक गहराई और अलौकिक प्रेम गाथा के कारण पूरी दुनिया के भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.




