मुंडेश्वरी मंदिर का चमत्कार, बिना वध मूर्छित होता है बकरा, सूर्य के साथ रंग बदलता है शिवलिंग

यहां मनोकामना पूर्ण होने पर बकरे की बलि चढ़ाई जाती है, लेकिन रक्त की एक बूंद भी नहीं बहाई जाती. संकल्प के बाद बकरे को माता की मूर्ति के समक्ष लाया जाता है. पुजारी देवी की प्रतिमा से स्पर्श कराया गया अक्षत बकरे पर छिड़कते हैं. अक्षत लगते ही बकरा तुरंत अचेत होकर गिर पड़ता है और पूजा संपन्न होने के बाद पुनः अक्षत छिड़कने पर बकरा जीवित होकर उठ खड़ा होता है.

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कैमूर, बिहार: बिहार के कैमूर जिले में भभुआ से लगभग 14 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम स्थित पंवरा पहाड़ी पर विराजे श्री मुंडेश्वरी भवानी एवं महामंडलेश्वर महादेव का मंदिर देश के सबसे प्राचीन और जीवंत मंदिरों में गिना जाता है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार यह मंदिर 4वीं शताब्दी या उससे भी पुराना है. इतिहास, रहस्य और आस्था का यह त्रिवेणी संगम आज भी वैज्ञानिकों और श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है.

शिलालेख, विदेशी यात्री और प्राचीन गुरुकुल

इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व अतुलनीय है. वर्ष 1812 से 1904 के बीच ब्रिटिश यात्री आर.एन. मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और ब्लाक ने इस स्थल का दौरा किया था. प्रसिद्ध पुरातत्वविद अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी अपनी पुस्तक में कैमूर की इस पहाड़ी और मंदिर के भग्नावशेषों का उल्लेख किया है. एक प्राचीन शिलालेख में संवत्सर के 30वें वर्ष के कार्तिक मास के 22वें दिन का जिक्र है, जिसमें एक स्थानीय राजा द्वारा मंदिर में तेल और अन्न की व्यवस्था का आदेश उत्कीर्ण है. पहाड़ी पर तमिल और सिंहली लिपि में खुदे अक्षर इस बात के गवाह हैं कि प्राचीन काल में यहां श्रीलंका और दक्षिण भारत से भी साधक आते थे. माना जाता है कि यह परिसर प्राचीन समय में एक महान गुरुकुल आश्रम था.

दुर्लभ अष्टकोणीय वास्तुकला और चमत्कारिक शिवलिंग

पत्थरों से तराशा गया यह मंदिर भारत की दुर्लभ अष्टकोणीय वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इसके चार द्वारों में से वर्तमान में एक बंद और एक अर्ध-द्वार है. मंदिर के पूर्वी खंड में देवी मुंडेश्वरी वाराही रूप में महिष पर सवार हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी ने चंड के वध के बाद इसी पहाड़ी में छिपे राक्षस मुंड का संहार किया था. मंदिर के मध्य में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग का पत्थर अद्भुत है. दिन के समय सूर्य की दिशा और रोशनी के हिसाब से शिवलिंग के पत्थर का रंग बदलता रहता है. मुख्य मंदिर के पश्चिम में विशाल नंदी की प्राचीन प्रतिमा आज भी सुरक्षित है, वहीं पहाड़ी के बिखरे पत्थरों पर सिद्ध श्रीयंत्र और मंत्र उत्कीर्ण हैं.

देश की इकलौती सात्विक एवं अहिंसक बलि परंपरा

मुंडेश्वरी धाम का सबसे बड़ा चमत्कार यहां की बलि परंपरा है. यहां मनोकामना पूर्ण होने पर बकरे की बलि चढ़ाई जाती है, लेकिन रक्त की एक बूंद भी नहीं बहाई जाती. संकल्प के बाद बकरे को माता की मूर्ति के समक्ष लाया जाता है. पुजारी देवी की प्रतिमा से स्पर्श कराया गया अक्षत बकरे पर छिड़कते हैं. अक्षत लगते ही बकरा तुरंत अचेत होकर गिर पड़ता है और पूजा संपन्न होने के बाद पुनः अक्षत छिड़कने पर बकरा जीवित होकर उठ खड़ा होता है.

मेला, उत्सव और पर्यटन मार्ग

प्रतिवर्ष माघ पंचमी से पूर्णिमा तक पहाड़ी पर विशाल मेले का आयोजन होता है. इसके अलावा चैत्र और शारदीय नवरात्रि में लाखों श्रद्धालु यहां मत्था टेकते हैं. यहां पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन मोहनियां (भभुआ रोड) है, जो पटना-गया रेल लाइन पर है. पटना से रामगढ़ गांव तक BSTDC और निजी बसें चलती हैं. पहाड़ी के ऊपर मंदिर द्वार तक कार या जीप जाने के लिए पक्की सड़क बनी है. सीढ़ियों के अलावा श्रद्धालुओं के लिए रोप-वे और विश्रामालय का निर्माण कराया गया है.

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