मुंडकटिया मंदिर: उत्तराखंड का वो रहस्यमयी धाम, जहां होती है गणेश जी के ‘बिना सिर वाले धड़’ की पूजा

उत्तराखंड की पहाड़ियों में एक ऐसा अनोखा और रहस्यमयी मंदिर भी स्थित है, जहां बप्पा के हाथी वाले रूप की नहीं, बल्कि उनके मस्तक-विहीन (बिना सिर वाले) मानव धड़ की पूजा की जाती है.

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उत्तराखंड… एक ऐसी पावन धरती जहां के कण-कण में चमत्कार और पौराणिक इतिहास समाया हुआ है. हम सबने भगवान श्री गणेश के गजानन यानी हाथी के शीश वाले स्वरूप की पूजा की है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड की पहाड़ियों में एक ऐसा अनोखा और रहस्यमयी मंदिर भी स्थित है, जहां बप्पा के हाथी वाले रूप की नहीं, बल्कि उनके मस्तक-विहीन (बिना सिर वाले) मानव धड़ की पूजा की जाती है? हम बात कर रहे हैं केदारनाथ मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध मुंडकटिया गणेश मंदिर (Mundkatia Temple) की. आइए जानते हैं इस मंदिर से जुड़ा वो पौराणिक रहस्य, जिसे सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं.

कहां स्थित है मुंडकटिया मंदिर?

यह प्राचीन मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग पर स्थित है. केदारनाथ यात्रा के प्रमुख पड़ाव सोनप्रयाग से मात्र 2 से 3 किलोमीटर आगे चलने पर एक छोटा और शांत गांव मुनकटिया गांव आता है. इसी गांव के समीप घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच यह पावन धाम स्थित है. स्थानीय भाषा में मुंड का अर्थ होता है सिर और कटिया का अर्थ होता है कटा हुआ अर्थात वह स्थान जहां शीश कटा था. इस मंदिर की देखरेख और दैनिक पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी पीढ़ियों से यहां का स्थानीय गोस्वामी परिवार निभा रहा है.

क्यों कटा था बाल गणेश का शीश?

शिव पुराण के अनुसार, यह स्थान उस ऐतिहासिक और दिव्य घटना का साक्षी है जिसने पूरे ब्रह्मांड को हिलाकर रख दिया था. माता पार्वती पास ही स्थित गौरीकुंड में स्नान करने जा रही थीं. उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए. माता ने बालक को आदेश दिया कि जब तक वे स्नान करके बाहर न आएं, किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दिया जाए. तभी वहां भगवान शिव का आगमन हुआ. बालक गणेश इस बात से अनजान थे कि महादेव ही उनके पिता हैं.जब शिव जी ने अंदर जाने का प्रयास किया, तो बालक ने उन्हें रोक दिया. महादेव के समझाने पर भी जब गणेश टस से मस नहीं हुए, तो क्रोधित होकर शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया. मुंडकटिया मंदिर ठीक वही सटीक स्थान माना जाता है, जहां भगवान शिव ने बाल गणेश का मस्तक काटा था.

    यहां बिना सिर वाली मूर्ति की पूजा क्यों होती है?

    कथा के अनुसार, जब माता पार्वती स्नानगृह से बाहर आईं और अपने पुत्र को मस्तक-विहीन देखा, तो उनका क्रोध चरम पर पहुंच गया. सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव के आदेश से उत्तर दिशा से एक गज (हाथी) का शीश लाया गया और इसी स्थान पर गणेश जी को पुनर्जीवित किया गया. फिर भी यहां बिना सिर वाले धड़ की पूजा क्यों? मान्यता है कि गणपति बाप्पा के उस मूल मानव स्वरूप और शिव-लीला की उस ऐतिहासिक घटना की याद को सदैव अमर रखने के लिए, आज भी यहां उनके बिना सिर वाले धड़ की ही पूजा की जाती है.

    केदारनाथ यात्रा से जुड़ी खास मान्यता

    केदारनाथ धाम जाने वाले तीर्थयात्री सदियों से इस मंदिर में रुकते आए हैं. श्रद्धालुओं में अटूट विश्वास है कि, केदारनाथ की कठिन और दुर्गम यात्रा पर आगे बढ़ने से पहले जो भी भक्त मुंडकटिया धाम में शीश नवाता है, विघ्नहर्ता गणेश उसकी यात्रा के सभी संकट दूर कर देते हैं. जीवन में आने वाली हर बाधा और विघ्न यहां दर्शन मात्र से समाप्त हो जाते हैं. इसी कारण गणेश चतुर्थी और यात्रा सीज़न के दौरान देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु इस दिव्य और अनोखे विग्रह के दर्शन करने पहुंचते हैं.

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