मुक्तिनाथ धाम यात्रा: जानें मान्यताएं, पौराणिक कथा और पहुंचने का पूरा रोडमैप

वृंदा को छल का आभास हुआ, तो उसने व्यथित होकर श्रीहरि को कीड़े-मकोड़ों द्वारा काटे जाने और पाषाण (पत्थर) बनने का श्राप दे दिया. विष्णु जी ने अपनी भक्त के श्राप को शिरोधार्य किया और गंडक नदी में शालिग्राम शिला के रूप में प्रकट हुए

0
36

नेपाल: बर्फीली चोटियों और मस्टैंग घाटी की गोद में बसा मुक्तिनाथ मंदिर सनातन हिंदू और बौद्ध धर्म के श्रद्धालुओं के लिए परम आस्था का केंद्र है. वैष्णव संप्रदाय के 108 पवित्र दिव्य देशों में शामिल यह धाम समुद्र तल से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां आने वाले हर भक्त को सांसारिक दुखों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

मुक्तिनाथ की महिमा और शालिग्राम का रहस्य

मुक्तिनाथ क्षेत्र को पौराणिक काल से मुक्तिक्षेत्र कहा जाता है. इस पावन स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यहां मिलने वाले शालिग्राम हैं. जिसे भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप माना जाता है.ये शिलाएं मुख्य रूप से नेपाल की प्रसिद्ध काली गंडकी नदी के तट पर मिलती हैं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ये अमोनाइट जीवाश्म के अवशेष हैं, जो टेथिस सागर के समय के माने जाते हैं. हिंदू धर्म के साथ ही साथ ये स्थल बौद्ध अनुयायियों के लिए भी बेहद पवित्र है. माना जाता है कि महान बौद्ध भिक्षु गुरु पद्मसंभव ने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने से पहले इसी मार्ग से यात्रा की थी.

जब विष्णु जी को बनना पड़ा पत्थर

शास्त्रों के अनुसार, शालिग्राम शिला के प्रकट होने के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी है. जब भगवान शिव और असुरराज जालंधर के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था, तब जालंधर को उसकी पत्नी वृंदा के सतीत्व बल के कारण पराजित करना असंभव था. देवताओं के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण किया, जिससे वृंदा का सतीत्व भंग हो गया और जालंधर युद्ध में मारा गया. जब वृंदा को इस छल का आभास हुआ, तो उसने व्यथित होकर श्रीहरि को कीड़े-मकोड़ों द्वारा काटे जाने और पाषाण (पत्थर) बनने का श्राप दे दिया. विष्णु जी ने अपनी भक्त के श्राप को शिरोधार्य किया और गंडक नदी में शालिग्राम शिला के रूप में प्रकट हुए.

मुक्तिनाथ यात्रा का पूरा प्लान

दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित होने के बावजूद हर साल हजारों श्रद्धालु इस कठिन यात्रा को पूरा करते हैं. आप 5 दिनों में अपनी यात्रा प्लान कर सकते हैं. यात्रा के पहले दिन काठमांडू से लगभग 200 किमी दूर स्थित पोखरा शहर पहुंचें. दिन में पोखरा की खूबसूरत झीलों और नजारों का आनंद लें. दूसरे दिन पोखरा से 20 मिनट की फ़्लाइट लेकर जोमसोम पहुंचें. यहां से लगभग 2 घंटे की चढ़ाई करके कागबेणी गांव पहुंचे और रात्रि विश्राम करें. तीसरे दिन कागबेणी से लगभग 6 घंटे की चढ़ाई पूरी कर मुक्तिनाथ पहुंचे. पवित्र जल में स्नान करें, दर्शन-पूजन करें और संध्या आरती में भाग लें. दर्शन के बाद नीचे उतरना शुरू करें और जोमसोम पहुंचकर रात्रि विश्राम करें. जोमसोम से पोखरा के लिए उड़ान भरें और फिर काठमांडू के लिए प्रस्थान करें. समय की बचत के लिए पोखरा या जोमसोम से डायरेक्ट हेलीकॉप्टर सेवा का विकल्प भी चुना जा सकता है.

यात्रियों के लिए सुझाव

पूरे मार्ग में निजी लॉज उपलब्ध हैं जहां बुनियादी सुविधाएं मिल जाती हैं. विदेशी पर्यटकों की आवाजाही के कारण यहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन, सीलबंद पानी और पारंपरिक नेपाली दाल-भात आसानी से मिलता है. अत्यधिक ठंड और अप्रत्याशित मौसम से बचने के लिए अपने साथ गुणवत्ता वाला स्लीपिंग बैग और गर्म कपड़े ज़रूर रखें. सामान उठाने के लिए पिट्ठू और रास्ते की जानकारी के लिए स्थानीय गाइड आसानी से किराए पर मिल जाते हैं.

वीज़ा और मुद्रा

भारतीय नागरिकों के लिए नेपाल प्रवेश हेतु किसी वीज़ा की आवश्यकता नहीं है. यदि आप हवाई मार्ग से यात्रा कर रहे हैं, तो अपना मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) या पासपोर्ट साथ रखना अनिवार्य है. नेपाल में भारतीय 100 के नोट आसानी से चलते हैं. 100 INR का मूल्य लगभग 160 नेपाली रुपये होता है. ध्यान दें कि 200, 500 के बड़े भारतीय नोट ले जाने पर प्रतिबंध हो सकता है.

भारत से मुक्तिनाथ कैसे पहुंचें?

हवाई मार्ग से अगर आप यात्रा करना चाहते हैं तो, दिल्ली, कोलकाता, वाराणसी, बेंगलुरु और पटना से काठमांडू के लिए सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं. काठमांडू पहुंचकर आप पोखरा और फिर जोमसोम होते हुए मुक्तिनाथ जा सकते हैं. या फिर दिल्ली या कोलकाता से सड़क मार्ग द्वारा बीरगंज (रक्सौल बॉर्डर) या गोरखपुर (सुनौली बॉर्डर) के रास्ते काठमांडू और पोखरा पहुंचा जा सकता है. रक्सौल से काठमांडू की हवाई दूरी केवल 30 मिनट की है.

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here