सनातन परंपरा में तीज और त्योहार केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे अटूट आस्था, संकल्प और प्रेम की पौराणिक गाथाएं छिपी हैं. भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरितालिका तीज का त्योहार इसी आस्था और भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है. 24 घंटे से भी अधिक समय तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके नामकरण की कहानी भी बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायी है.
क्यों पड़ा इस व्रत का नाम ‘हरितालिका’?
बहुत से लोग इस बात से अंजान हैं कि एक पवित्र व्रत का नाम अपहरण से कैसे जुड़ा है. संस्कृत व्याकरण के अनुसार हरित का अर्थ है हरण करना या अगवा करना और आलिका का अर्थ सखी या सहेली है. पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता पार्वती के पिता पर्वतों के राजा हिमाचल ने देवर्षि नारद के प्रस्ताव पर अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया, तब माता पार्वती स्तब्ध रह गईं. उन्होंने मन, वचन और कर्म से केवल भगवान शिव को अपना पति स्वीकार किया था. अपने प्रेम की रक्षा के लिए माता पार्वती ने अपनी सखियों की मदद ली। सखियों ने एक अंधेरी रात में गुप्त रूप से उनका हरण किया और उन्हें एक घने, निर्जन जंगल की गुफा में ले गईं. सखियों द्वारा हरण किए जाने के कारण ही अनंत काल के लिए इस पावन पर्व का नाम हरितालिका तीज पड़ा.
कठोर तपस्या और ‘अपर्णा’ नाम की गाथा
राजमहल के मखमली गद्दे और सुख-सुविधाएं त्यागकर माता पार्वती जंगल की एक गुफा में निवास करने लगीं. उन्होंने नदी तट की बालू और मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण किया और कठोर तपस्या में लीन हो गईं. गर्मी की तपती धूप, कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश के बीच बिना अन्न-जल के केवल ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए उन्होंने वर्षों बिताए. शुरुआत में उन्होंने केवल सूखे पत्ते खाए और अंत में पत्तों का सेवन भी बंद कर दिया, जिसके कारण पौराणिक ग्रंथों में उन्हें अपर्णा कहा गया.
जब डोल उठा महादेव का आसन
माता पार्वती की इस निश्चल भक्ति और अटूट जिद की तपन सीधे कैलाश पर्वत तक पहुंची. और कैलाश पर्वत डोल उठा, तब महादेव माता पार्वती के इस सच्चे प्रेम और उनकी सखियों के त्याग को देखकर भावविभोर हो गए. भाद्रपद शुक्ल तृतीया के ही दिन भगवान शिव गुफा में प्रकट हुए और माता पार्वती की मनोकामना पूरी करते हुए उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया.
संस्कृति और आस्था का संगम
आज भी हरितालिका तीज का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि यदि संकल्प सच्चा हो तो ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है. यही कारण है कि सदियों बाद भी सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए, वहीं कुंवारी कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए इस अत्यंत कठिन व्रत को पूरे हर्षोल्लास और विधि-विधान के साथ रखती हैं.




