सरकार ने चांदी के आयात को “रिस्ट्रिक्टेड” श्रेणी में डाल दिया है। यानी अब बिना सरकारी मंजूरी के चांदी का आयात नहीं हो सकेगा। बाजार में इस फैसले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। क्या इससे चांदी महंगी होगी? क्या कालाबाजारी बढ़ेगी? क्या सरकार रुपये को बचाने की कोशिश कर रही है? ऐसे तमाम सवाल इस समय हर निवेशक के मन में उठ रहे हैं। आज के इस लेख में इन्हीं सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है, ताकि निवेशकों के मन में चल रही दुविधा कुछ हद तक साफ हो सके।
सवाल: सरकार ने अचानक चांदी के आयात को रिस्ट्रिक्टेड क्यों किया?
जवाब:
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह भारत का बढ़ता आयात बिल है। पहले ही सोने के आयात पर सरकार का भारी खर्च हो रहा था और अब चांदी में भी तेजी से पैसा बाहर जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड और सिल्वर दोनों की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं। तेल भी पहले जहां 60-65 डॉलर के आसपास था, अब 110-120 डॉलर के ऊपर पहुंच चुका है। यानी भारत को डॉलर में कहीं ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और सरकार किसी भी हालत में डॉलर के मुकाबले रुपये को 100 के स्तर तक जाते नहीं देखना चाहती। ऐसे में सरकार ने पहले सोने पर सख्ती बढ़ाई और अब चांदी पर नियंत्रण की कोशिश की है ताकि डॉलर की निकासी कुछ कम हो सके।
सवाल: क्या सरकार को डर है कि गोल्ड-सिल्वर की मांग और बढ़ सकती है?
जवाब:
बिल्कुल। दुनिया भर में इस समय आर्थिक अनिश्चितता बढ़ रही है। स्टैगफ्लेशन की आशंका है। ऐसे माहौल में निवेशक गोल्ड और सिल्वर को सुरक्षित निवेश मानते हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े चांदी आयातकों में शामिल हो चुका है। सिल्वर ईटीएफ में भी भारी निवेश हो रहा है। जब लोग सिल्वर ईटीएफ खरीदते हैं तो फिजिकल सिल्वर की मांग भी बढ़ती है। इससे सरकार पर डॉलर का बोझ और बढ़ता है। सरकार की कोशिश है कि किसी तरह विदेशी मुद्रा पर दबाव कम किया जाए।
सवाल: क्या इससे घरेलू बाजार में चांदी महंगी हो जाएगी?
जवाब:
एमसीएक्स पर बहुत बड़ा फर्क शायद न दिखे क्योंकि वहां कीमतें अंतरराष्ट्रीय मार्केट से तय होती हैं। लेकिन फिजिकल मार्केट में असर जरूर दिख सकता है। अब जो चांदी पहले खुले तौर पर आती थी, वह सरकारी मंजूरी के बाद ही आएगी। इसका मतलब सप्लाई कम हो सकती है। सप्लाई कम हुई तो ज्वेलरी, सिल्वर बार और सिक्कों में प्रीमियम बढ़ सकता है। यानी बाजार में एक्सचेंज वाली कीमत कुछ और होगी और असली बाजार में खरीदने पर अलग रेट मिल सकता है।
सवाल: क्या इससे कालाबाजारी और जमाखोरी बढ़ सकती है?
जवाब:
ऐसी आशंका पूरी तरह है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिल्वर फिर तेज भागा तो भारत में प्रीमियम तेजी से बढ़ सकता है। जिन लोगों के पास पहले से बड़ी मात्रा में चांदी मौजूद है, वे उसे रोक कर रख सकते हैं। इसके अलावा पुराने चांदी के बर्तन, आभूषण और घरेलू सिल्वर भी बाजार में ऊंचे दाम पर बिकने आ सकते हैं। जब भी किसी चीज की सप्लाई पर कंट्रोल बढ़ता है, वहां कालाबाजारी की संभावना बढ़ जाती है।
सवाल: क्या सोने की तस्करी भी बढ़ सकती है?
जवाब:
इतिहास यही बताता है। जब-जब सोने पर ज्यादा नियंत्रण लगाया गया, स्मगलिंग बढ़ी। सोने की तस्करी आसान होती है क्योंकि कम जगह में ज्यादा मूल्य का माल लाया जा सकता है। चांदी भारी धातु है, इसलिए उसकी तस्करी उतनी आसान नहीं होती। लेकिन अगर गोल्ड और सिल्वर दोनों में सप्लाई पर दबाव बढ़ा तो अवैध रास्ते सक्रिय हो सकते हैं। सरकार भी इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठा सकती है।
सवाल: लोग कह रहे हैं कि सरकार “क्लोज इकॉनमी” की तरफ बढ़ रही है। क्या यह सही है?
जवाब:
जब सरकारें दबाव में होती हैं तो आसान रास्ता रोक लगाना होता है। लेकिन सिर्फ रोक लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। असल जरूरत डॉलर की आवक बढ़ाने की है। विदेशी निवेश बढ़ाना होगा, एफआईआई और एफडीआई को आकर्षित करना होगा। भारत में पिछले कुछ वर्षों से विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी है। शेयर बाजार से लगातार पैसा निकल रहा है। इससे भी रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
सवाल: रुपया लगातार कमजोर क्यों हो रहा है?
जवाब:
इस समय सबसे ज्यादा दबाव रुपये पर है। तेल महंगा है, गोल्ड-सिल्वर का आयात महंगा है और विदेशी निवेशक भी पैसा निकाल रहे हैं। हालांकि भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़ा है और एफडीआई भी आया है, लेकिन बाजार को भरोसा देने के लिए और कदमों की जरूरत है। दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में रुपया ज्यादा फिसला है। यही चिंता की बात है।
सवाल: क्या सरकार के पास और भी विकल्प हैं?
जवाब:
बिल्कुल हैं। सरकार चाहे तो विदेशी निवेश को टैक्स राहत दे सकती है। एनआरआई निवेश को प्रोत्साहित कर सकती है। 1991 में रुपये के अवमूल्यन के बाद भारत में निवेश बढ़ा था क्योंकि विदेशी निवेशकों को भारत सस्ता लगा। अभी भी रुपया काफी कमजोर हो चुका है, लेकिन उस हिसाब से निवेश नहीं आया। सरकार को निवेश आकर्षित करने वाली नीतियों पर भी जोर देना होगा।
सवाल: चीन लगातार सिल्वर क्यों खरीद रहा है?
जवाब:
चीन बहुत लंबी रणनीति पर काम करता है। उसने रेयर अर्थ मेटल्स में पहले ही दुनिया पर पकड़ बना ली है। अब वह सिल्वर में भी बड़ी तैयारी कर रहा है। रिन्यूएबल एनर्जी, सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल सेक्टर में सिल्वर की मांग तेजी से बढ़ने वाली है। चीन शायद आने वाले समय को देखते हुए सिल्वर जमा कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के एक्सचेंजों में सिल्वर स्टॉक तेजी से बढ़ा है और वहां कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार से ऊपर चल रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि चीन आक्रामक खरीदारी कर रहा है।
सवाल: हाल में सिल्वर में आई भारी गिरावट के पीछे क्या चीन था?
जवाब:
मार्केट में ऐसी चर्चा जरूर रही। आमतौर पर अमेरिका में बिकवाली होती थी और बाद में चीन उसका असर दिखाता था। लेकिन इस बार चीन के बाजार में पहले बड़ी गिरावट दिखाई दी। इसके बाद अमेरिकी बाजार में भारी दबाव बना। साथ ही चीन और अंतरराष्ट्रीय बाजार के बीच कीमतों का अंतर भी बढ़ा। इससे यह संकेत मिला कि चीन रणनीतिक तरीके से बाजार को इस्तेमाल कर रहा है।
सवाल: आने वाले समय में सबसे बड़ा खतरा क्या है?
जवाब:
सबसे बड़ा खतरा रुपये पर दबाव है। अगर तेल और महंगा हुआ और गोल्ड-सिल्वर की मांग इसी तरह बढ़ती रही तो रुपये पर और दबाव आ सकता है। सरकार फिलहाल डॉलर की निकासी रोकने की कोशिश कर रही है। लेकिन असली समाधान तभी होगा जब भारत में डॉलर की आवक बढ़े, निवेश बढ़े और बाजार में भरोसा मजबूत हो। अभी बाजार, रुपया, तेल और कीमती धातुओं — चारों मोर्चों पर दबाव बना हुआ है।
यह लेख निवेशकों के मन में उठ रहे कई सवालों के जवाब देने की एक कोशिश है। अगर आपके मन में भी कोई सवाल है तो उसे कमेंट में जरूर लिखें। निवेश का सबसे बड़ा नियम यही माना जाता है कि वही पैसा निवेश करें जिसकी तुरंत जरूरत न हो और लंबी अवधि का धैर्य रखें, क्योंकि अक्सर सब्र का फल मीठा होता है।




