Bakrid: हर साल रमज़ान के ठीक 70 दिन बाद, इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने ज़ुल-हिज्जा में एक ऐसा त्योहार आता है, जो हमें केवल पकवानों या खुशियों की याद नहीं दिलाता, बल्कि इतिहास में घटे उस घटना की याद दिलाता है जिसने पूरी दुनिया के सामने प्यार और समर्पण की मिसाल पेश की. हम बात कर रहे हैं ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद की.
इब्राहिम और इस्माईल की वो कठिन परीक्षा
ये कहानी है इस्लाम के पैगंबर हज़रत इब्राहिम और उनके बेटे हज़रत इस्माईल की. हज़रत इब्राहिम, जो अल्लाह के सबसे करीबी बंदों में से एक माने जाते थे, उन्हें 86-87 वर्ष की आयु में 40 वर्षों की मन्नत और दुआओं के बाद उन्हे बेटा हुआ था. ये उनकी जिंदगी का सबसे हसीन पल था. लेकिन इस खुशी के बीच अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम की भक्ति और सब्र को परखने के लिए एक कठिन परीक्षा लेने की ठानी. हज़रत इब्राहिम को लगातार तीन रातों तक स्वप्न में अल्लाह का आदेश मिला कि वे अपनी सबसे प्यारी चीज़ अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें. उन्होंने अपनी सबसे प्यारी चीज़ अपने इकलौते बेटे इस्माईल को कुर्बान करने का कठिन निर्णय लिया.
सब्र और अटूट विश्वास की पराकाष्ठा
जब हज़रत इब्राहिम ने हज़रत हाजरा जो इस्माईल की मां थी, उन्हें अपने इस फैसले के बारे में बताया. तो उनका हौसला फौलाद जैसा था. उनका जवाब था, अगर ये अल्लाह का हुक्म है, तो मेरे एक क्या, हजार बेटे भी कुर्बान हैं. मीना के मैदान की ओर जाते समय शैतान ने उन्हें बहकाने की कोशिश की, लेकिन हज़रत इब्राहिम और उनके परिवार ने उसे कंकड़ मारकर भगा दिया. आज भी हज के दौरान शैतान को कंकड़ मारना का सिलसिला इसी महान घटना की याद में निभाई जाती है.
वह करिश्मा, जिसने बचाई जान
कुर्बानी के स्थान पर पहुंचकर, हज़रत इस्माईल ने अपने पिता से कहा- बाबा, मुझे रस्सी से बांध दीजिए और अपनी आंखों पर पट्टी बांध लीजिए, ताकि आपका पिता-प्रेम आपके हाथों को डगमगा न दे. जैसे ही हज़रत इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर छुरी चलाई, अल्लाह ने उनकी परीक्षा पूरी कर ली थी. जब उन्होंने पट्टी हटाई, तो हज़रत इस्माईल सही सलामत खड़े थे और उनकी जगह जन्नत से भेजा गया एक दुम्बा (भेड़) कुर्बान हो चुका था. यह इस बात का प्रतीक बना कि अल्लाह को केवल नेक नीयत और त्याग का जज़्बा चाहिए.
कुर्बानी से जुड़े महत्वपूर्ण नियम
इस्लाम में कुर्बानी केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि इसके कड़े सामाजिक और धार्मिक नियम हैं. यह केवल उन लोगों पर वाजिब है जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं और जिनकी संपत्ति एक तय सीमा से अधिक है. कर्जदार व्यक्ति के लिए कुर्बानी करना मना है. कुर्बानी के लिए उपयोग किया जाने वाला धन पूरी तरह से ईमानदारी से कमाया हुआ होना चाहिए.
इबादत की रूह
आज सदियों बाद भी ईद-उल-अज़हा का महत्व केवल गोश्त और पकवानों तक सीमित नहीं है. इसका वास्तविक संदेश है त्याग. जैसा कि अल्लाह ने फरमाया है: “ईश्वर के पास जानवरों का मांस या खून नहीं पहुंचता, बल्कि उनके पास पहुंचता है आपके दिल का जज़्बा, नेक नीयत और इबादत की रूह. ये त्योहार हमें सिखाता है कि जो हमें सबसे प्रिय है, उसे ईश्वर की राह में देने के लिए तैयार रहना और समाज के वंचितों को साथ लेकर चलना ही असली इबादत है.




