गया का प्रेतशिला पर्वत: जहां हवा में सत्तू उड़ाने से भटकी आत्माओं को मिलता है मोक्ष | Pretshila Hill Gaya

जिन परिवारों में किसी सदस्य की दुर्घटना या अकाल मृत्यु के कारण सत्तू खाना वर्जित (सूतक) हो जाता है, वे प्रेतशिला आकर सत्तू उड़ाने की रस्म निभाने के बाद ही पुनः सत्तू ग्रहण करते हैं.

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गया (बिहार): मौत… अंत नहीं है. कुछ आत्माएं वक्त से पहले किसी हादसे, हत्या या दुर्घटना का शिकार होकर शरीर तो छोड़ देती हैं, लेकिन इस दुनिया को छोड़ नहीं पातीं. सनातन धर्म में जहां जीवित मनुष्यों के लिए अनेक नियम बनाए गए हैं, वहीं अकाल मृत्यु का ग्रास बनी अतृप्त आत्माओं के लिए भी विशेष और संवेदनशील विधान मौजूद हैं. बिहार के गया में स्थित प्रेतशिला पर्वत इन्हीं तड़पती हुई आत्माओं के मोक्ष का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है.

676 सीढ़ियों पर आस्था का कड़ा इम्तिहान

गया रेलवे स्टेशन से लगभग 8 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित यह पथरीला और सूखा प्रेतशिला पर्वत सामान्य पिंडदान स्थलों से बिल्कुल अलग है. आमतौर पर गयाजी में पितरों का पिंडदान फल्गु नदी के तट या विष्णुपद मंदिर में होता है, लेकिन अकाल मृत्यु में गए परिजनों के लिए प्रेतशिला ही एकमात्र सहारा है. श्रद्धालुओं को पहाड़ की चोटी तक पहुंचने के लिए 676 खड़ी और कठिन सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है.

प्रेतशिला से जुड़ी प्रमुख विशेषताएं और पौराणिक मान्यताएं

पहलूविवरण / धार्मिक मान्यता
अनोखी रस्म (सत्तू उछालना)श्रद्धालु मुख्य धर्मशिला की 5 से 9 बार परिक्रमा कर काले तिल मिला सत्तू हवा में उछालते हैं. पंडित मंत्र पढ़ते हैं: ‘उड़ल सत्तू पितर को पैठ हो…’
शिलाओं का रहस्यपर्वत की दरारों से पितरों के हवा रूप में आने की मान्यता है. उड़ाए गए सत्तू का एक कण भी दरार में जाने पर आत्मा की भूख-प्यास शांत हो जाती है.
त्रेतायुग से संबंधराजा दशरथ की मृत्यु के बाद भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता ने यहां श्राद्ध किया था. राम जी के स्पर्श के बाद यह प्रेत पर्वत से ‘प्रेतशिला’ बना.
अहिल्याबाई होल्कर का योगदानचोटी पर स्थित यमराज मंदिर का जीर्णोद्धार 1787 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था और सीढ़ियों का निर्माण शुरू कराया था.

रात ढलते ही सन्नाटे में बदल जाता है पहाड़

इस पावन धाम का एक रहस्यमयी और डरावना पहलू भी है. पहाड़ के नीचे ब्रह्मकुंड के पास लगे विशाल पेड़ों पर लोग अपने उन परिजनों की तस्वीरें टांगते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो.सबसे बड़ा नियम यह है कि सूर्यास्त के बाद यहां रुकना सख्त मना है. शाम ढलते ही पूरे पहाड़ को खाली करा दिया जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रात के अंधेरे में पर्वत की शिलाओं और प्राकृतिक दरारों से अजीबोगरीब आवाजें आती हैं और अतृप्त आत्माएं यहां विचरण करती हैं.

सूतक समाप्त करने की अनूठी परंपरा

जिन परिवारों में किसी सदस्य की दुर्घटना या अकाल मृत्यु के कारण सत्तू खाना वर्जित (सूतक) हो जाता है, वे प्रेतशिला आकर सत्तू उड़ाने की रस्म निभाने के बाद ही पुनः सत्तू ग्रहण करते हैं. प्रेतशिला केवल डर या अंधविश्वास का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की उस गहराई का प्रतीक है जहां भटकी हुई आत्माओं को भी सम्मान और मोक्ष का मार्ग दिखाया जाता है.

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