रथयात्रा से 15 दिन पहले क्यों बीमार होते हैं महाप्रभु जगन्नाथ? जानिए भक्त और भगवान के अद्भुत प्रेम की कहानी

भगवान जगन्नाथ ने मुस्कुराकर कहा, प्रिय माधव! मैं तुम्हें इसी जन्म में मोक्ष देना चाहता हूं। प्रारब्ध और पिछले जन्मों के कर्मों का भोग भुगतने के बाद ही आत्मा पवित्र होती है। तुम्हारी बीमारी के अब केवल 15 दिन शेष बचे हैं।

0
18

ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में आस्था और श्रद्धा का एक अनुपम केंद्र है। हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु महाप्रभु जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस भव्य रथ यात्रा के शुरू होने से ठीक 15 दिन पहले भगवान जगन्नाथ एकांतवास में चले जाते हैं? इस विशेष अवधि को ‘अनसर काल’ कहा जाता है, जिसमें भगवान बीमार पड़ जाते हैं और किसी भी भक्त को उनके दर्शन की अनुमति नहीं होती। आइए जानते हैं आखिर क्यों हर साल बीमार पड़ते हैं जगत के स्वामी और इसके पीछे छिपे भक्त माधवदास के अगाध प्रेम का क्या रहस्य है।

सुगंधित जल से स्नान और ‘अनसर काल’ की शुरुआत

रथ यात्रा के उत्सव से पूर्व ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और माता सुभद्रा को 108 कलशों के पवित्र व सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है। इस पावन परंपरा को ‘स्नान पूर्णिमा’ कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस भव्य स्नान के बाद ही प्रभु को बुखार आ जाता है और वे अगले 15 दिनों के लिए अस्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान उन्हें औषधीय काढ़ा और विशेष भोग लगाया जाता है।

कौन थे भक्त माधवदास?

इस रहस्यमयी परंपरा के पीछे महाप्रभु के अनन्य भक्त माधवदास की एक बेहद भावुक कर देने वाली कथा जुड़ी हुई है। माधवदास पुरी के रहने वाले एक अत्यंत सीधे और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। सांसारिक मोह-माया और छल-कपट से दूर, उनका जीवन केवल प्रभु भक्ति में लीन रहता था। समय के साथ उनके परिवार के सदस्य एक-एक कर उनका साथ छोड़ते गए। जब उनकी पत्नी भी गंभीर बीमारी के कारण मृत्युशैया पर थीं, तब माधवदास ने अत्यंत व्याकुल होकर उनसे पूछा, तुम भी मुझे छोड़कर जा रही हो, अब इस संसार में मुझसे कौन प्रेम करेगा और मैं किसके सहारे जिऊंगा? तब उनकी पत्नी ने, जो स्वयं प्रभु की बड़ी भक्त थीं, माधवदास से कहा, आप पुरी जाकर साक्षात जगन्नाथ जी की शरण में चले जाइए। इस सृष्टि में उनसे ज्यादा प्रेम आपको कोई और नहीं कर सकता।

जब भक्त की जिद के आगे पिघले महाप्रभु

पत्नी के देहांत के बाद माधवदास पुरी आ गए। वे इतने निष्कपट थे कि वे मंदिर के सामने एक वृक्ष की छांव में बैठ गए। जब मंदिर के पुजारियों ने उन्हें महाप्रसाद देना चाहा, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। माधवदास ने बाल-सुलभ हठ पकड़ लिया कि वे केवल अपने सखा जगन्नाथ के हाथों से ही अन्न ग्रहण करेंगे। वे भूखे-प्यासे रहकर प्रभु की प्रतीक्षा करने लगे। अपने भक्त की ऐसी निश्छल निष्ठा और तड़प देखकर जगत के स्वामी का आसन डोल उठा। भगवान जगन्नाथ ने स्वयं रूप बदला और माधवदास के लिए भोजन लेकर पहुंचे। परंतु माधवदास ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया और रोते हुए बोले, यदि मेरे प्रभु मुझसे मिलने नहीं आए, तो इसका अर्थ है कि वे मुझे अपना मित्र नहीं मानते। भक्त की आंखों में आंसू और प्रेम की पराकाष्ठा देख भगवान भावुक हो उठे और उन्होंने अपने वास्तविक चतुर्भुज रूप में माधवदास को दर्शन दिए और अपने हाथों से उन्हें भोजन कराया।

भगवान ने स्वयं पर ली भक्त की बीमारी

इसके बाद कई वर्षों तक माधवदास पुरी में रहकर प्रभु के साथ एक सखा की तरह रहे। धीरे-धीरे समय चक्र बदला और माधवदास वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगे। वृद्ध होने पर वे गंभीर रूप से बीमार हो गए। उनकी इस स्थिति में स्वयं भगवान जगन्नाथ दिन-रात एक सेवक की तरह उनकी सेवा करते थे। एक दिन अत्यंत पीड़ा से कराहते हुए माधवदास ने प्रभु से पूछा, हे त्रिलोकीनाथ! आप तो पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं, क्या आप मेरी इस बीमारी को पल भर में ठीक नहीं कर सकते? तब दयानिधि भगवान जगन्नाथ ने मुस्कुराकर कहा, प्रिय माधव! मैं तुम्हें इसी जन्म में मोक्ष देना चाहता हूं। प्रारब्ध और पिछले जन्मों के कर्मों का भोग भुगतने के बाद ही आत्मा पवित्र होती है। तुम्हारी बीमारी के अब केवल 15 दिन शेष बचे हैं। इस पर माधवदास ने कहा, प्रभु! यह शारीरिक पीड़ा अब मुझसे सहन नहीं होती। अपने भक्त की कराह सुनकर दयालु भगवान से रहा नहीं गया। उन्होंने एक अद्भुत चमत्कार किया और माधवदास की बची हुई 15 दिनों की गंभीर बीमारी और उसकी समस्त पीड़ा को अपने ऊपर ले लिया।

तब से चली आ रही है यह परंपरा

जिस दिन भगवान ने माधवदास की बीमारी अपने ऊपर ली, वह ज्येष्ठ पूर्णिमा का दिन था। माधवदास तत्क्षण स्वस्थ हो गए और कुछ समय बाद उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई, लेकिन महाप्रभु जगन्नाथ स्वयं बीमार पड़ गए। तभी से यह अनूठी परंपरा निरंतर चली आ रही है। आज भी हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने और उनके हिस्से की बीमारी को स्वयं पर लेने के लिए 15 दिनों के लिए अस्वस्थ होते हैं और एकांतवास में चले जाते हैं। स्वस्थ होने के बाद वे पूरी भव्यता के साथ रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) के लिए यात्रा पर निकलते हैं, जिसे हम रथ यात्रा कहते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here