गिरता राजनीति का स्तर, बिगड़ते राजनेताओं के बोल, किसने शुरु किया शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन करना ?

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गिरता राजनीति का स्तर, बिगड़ते राजनेताओं के बोल, किसने शुरु किया शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन करना ?
गिरता राजनीति का स्तर, बिगड़ते राजनेताओं के बोल, किसने शुरु किया शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन करना ?

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश जहां का संविधान हर देशवासी को मौलिक अधिकार देता है, पूर्ण रुप से बोलने की आजादी देता है, लेकिन कुछ तथाकथित राजनेता बोलने की स्वतंत्रता में शब्दों की मर्यादा को भूलते नजर आ रहे है, सड़क से लेकर संसद जहां वैचारिक मतभेद होना चाहिए वहां व्यक्तिगत द्वेष ने जगह ले ली है।

प्रिशिता शर्मा


दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश जहां का संविधान हर देशवासी को मौलिक अधिकार देता है, पूर्ण रुप से बोलने की आजादी देता है, लेकिन कुछ तथाकथित राजनेता बोलने की स्वतंत्रता में शब्दों की मर्यादा को भूलते नजर आ रहे है, सड़क से लेकर संसद जहां वैचारिक मतभेद होना चाहिए वहां व्यक्तिगत द्वेष ने जगह ले ली है।
भाषा, राजनीति के लगातार गिरते स्तर को मापने का पैमाना है। इसमें किसी भी नेता का स्तर और मानसिकता का पता लगता है। किसी भी राजनीतिक दल के नेता कि भाषा की मर्यादा ही उसे बनाती है और गिराती है। आज के समय में आम होते व्यक्तिगत हमलों पर समर्थक भले ही ताली बजाते हों, लेकिन जनता जो अपनी सोच और समझ रखती है, वह उस नेता की मन में एक छवि बना लेती है, जो कई अच्छे बयान देने के बाद भी नहीं हटती।  


प्रधानमंत्री और गृहमंत्री गद्दार हैं – राहुल गांधी

हाल ही में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बुधवार को रायबरेली पहुंचे और सम्मेलन को संबोधित करते हुए फिर एक बार शब्दों की मर्यादा भूल गए। राहुल गांधी ने कहा – RSS के कार्यकर्ता आपके सामने आएंगे तो उनसे खुलकर कहिएगा कि आपका प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और संगठन गद्दार है। आपने हिंदुस्तान को बेचने का काम किया है। ये पहली बार नहीं है इसके पहले भी राहुल गांधी कई बार देश के प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं। चौकीदार चोर है वाले बयान पर राहुल गांधी को माफी भी मांगनी पड़ी थी।


मीडिया के सवाल पर भड़के थे मंत्री कैलाश विजयवर्गीय

सिर्फ राहुल गांधी ही नहीं विपक्ष के कई नेताओं के साथ-साथ सत्तापक्ष के नेता भी मीडिया के सामने अपने शब्दों को संभाल नहीं पाए।देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल करने वाले इंदौर में दूषित पानी से मौतों के मामले में जब मध्यप्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से सवाल पुछा गया तो उन्होंने ‘घंटा’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था।


एक मंत्री ने कर्नल सोफिया पर दिया था विवादित बयान

ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ मध्यप्रदेश के कैबिनेट मंत्री कुंवर विजय शाह  ने एक सार्वजनिक सभा में बेहद आपत्तिजनक और विवादित टिप्पणी की थी।उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि, “जिन्होंने हमारी बेटियों के सिंदूर उजाड़े थे, उन्हीं कटे-पिटे लोगों को हमने उन्हीं की बहन भेजकर ‘ऐसी की तैसी’ करवाई।”  ये पुरा मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।

नेताओं पर त्वरित लोकप्रियता का बढ़ता दवाब

आज के समय में नेताओं के सड़क से संसद तक शब्दों की मर्यादा भूलने का सबसे मुख्य कारण बढ़ती चुनावी प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया के दबाव में त्वरित लोकप्रियता हासिल करने की चाहत समझ में आता है। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संवादहीनता और बर्दाश्त न करने की भावना के कारण सदन में भी गरिमापूर्ण बहस की बजाय शोरगुल और अभद्र भाषा का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है।लोकसभा के सत्र के दौरान चलने वाली बहस कितनी संसदीय भाषा में होती है, ये किसी ये छिपा नहीं है।  चुनावी रैलियों और संसद में कुछ राजनेताओं द्वारा दिए गए बयानों को कई बार रिकॉर्ड से हटाया गया है,कई बयानों में नौबत कानूनी कार्रवाई तक भी पहुंची है। राजनीति में भाषा की मर्यादा को बनाए रखना लोकतांत्रिक चर्चा के लिए जरूरी है और इसे राजनेताओं को ही संभालना है। इस तरह के बयान सामने आने के बाद अक्सर संबंधित दलों को स्पष्टीकरण देना पड़ता है या माफी मांगनी पड़ती है। जब भी कोई बड़ा नेता मर्यादित भाषा की सीमा लांघता है, तो देश भर में एक बहस छिड़ जाती है। सत्ता पक्ष बयानों को पद की गरिमा के खिलाफ बताता है और विपक्षी दल अक्सर इसे नीतियों की आलोचना का हिस्सा बताते हैं।

जब इंदिरा जी और अटल जी गरजते थे

राजनीति में भाषा के गिरते स्तर से ही सवाल पूछने की गुंजाइश खत्म हो जाती है, नेता यह मान बैठे हैं कि वे सर्वेसर्वा है और जो कह रहे हैं, वही सत्य है, लेकिन भारत की राजनीति में अटल बिहारी, इंदिरा गांधी जैसे नेता भी जनता ने देखे हैं, उनके बयान और भाषण शैली आज भी लोगों के मस्तिष्क में सशब्द छपी हुई है।उस समय भी नीतियों की आलोचना होती थी, सत्ता पक्ष अपनी बात रखता था विपक्ष अपनी आपत्ति दर्ज करवाता था। वे भी दहाड़ते थे, पर उसमें संयम था।अटल जी का मानना था कि सदन की कार्यवाही में शब्दों की मर्यादा और आपसी सम्मान ही लोकतंत्र की आत्मा है। वह अक्सर कहते थे कि संसद में “कमर के नीचे वार” यानि निजी हमले नहीं होने चाहिए।


140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में एक भी वोटर ऐसा नहीं होगा जो भाषा के गिरते स्तर से खुश होगा, लेकिन जाति-धर्म, संप्रदाय की राजनीति में उसे ऐसा फंसाया गया है कि कई बार अंतर करना मुश्किल हो जाता है। तर्क-कुतर्क में खोती जा रही शब्दों की मर्यादा को मतदाताओं की जागरूकता ही सुधार सकती है।

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