बिहार: सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की आगामी फिल्म ‘द वीवान’ को लेकर सोशल मीडिया और सिनेमा जगत में काफी चर्चा है. फिल्म में जिस रहस्यमयी बैकग्राउंड को दिखाया जा रहा है, उसने दर्शकों के मन में भारी उत्सुकता पैदा कर दी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मंदिर और कहानी को इस फिल्म का आधार बनाया जा रहा है, वह महज़ कोई काल्पनिक कहानी या फिल्मी सेट नहीं है? यह स्थान पूरी तरह वास्तविक है और पिछले 400 वर्षों से लाखों सनातनी भक्तों की अटूट आस्था का केंद्र रहा है.
कहां स्थित है यह दिव्य मंदिर?
यह चमत्कारी और ऐतिहासिक स्थान है मां वन देवी, जो बिहार की राजधानी पटना से लगभग 35 किलोमीटर दूर बिहटा ब्लॉक में स्थित है. यह धाम विशेष रूप से अमहरा, राघोपुर और कंचनपुर नामक तीन गांवों की सीमाओं के बिल्कुल मध्य में स्थित है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह धाम लगभग 350 से 400 वर्ष प्राचीन है, जिसका संबंध 16वीं शताब्दी से माना जाता है.
बिना मूर्ति के होती है पूजा
मां वन देवी मंदिर की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि यहां माता की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है. यहां साक्षात जगदंबा की आराधना पिंडी रूप में की जाती है. सनातन परंपरा में आदिकाल से ही पिंडी रूप की पूजा को अत्यंत शक्तिशाली और जागृत माना गया है.
पौराणिक कथा और स्थापना का इतिहास
इस क्षेत्र को विंध्याचल की दिव्य शक्ति का ही एक अंश माना जाता है. सदियों पहले यह पूरा क्षेत्र एक अत्यंत घने जंगल से घिरा हुआ था. उस काल में माता के परम भक्त विद्यानंद मिश्र जी ने विंध्याचल जाकर मां विंध्यवासिनी की कठोर आराधना की. साधना से प्रसन्न होकर वे माता की इस पावन पिंडी को अपने साथ यहां लेकर आए और इस निर्जन वन में स्थापित कर दिया. घने वन में स्थापित होने के कारण ही इन्हें ‘मां वन देवी’ कहा जाने लगा. वर्ष 1958 में परम पूज्य संत भगवान दास त्यागी जी के नेतृत्व में यहां एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसके बाद मंदिर को औपचारिक और भव्य स्वरूप मिला. सैकड़ों वर्षों से इस पावन धाम में माता की आराधना वैदिक और तांत्रिक दोनों ही गुप्त विधियों से की जाती रही है.
सूर्यास्त के बाद इंसानों का प्रवेश वर्जित क्यों?
मां वन देवी मंदिर का सबसे कड़ा नियम इसे पूरे भारत में अद्वितीय बनाता है. सूर्यास्त के बाद यहां किसी भी मनुष्य का रुकना पूरी तरह प्रतिबंधित है. शाम की अंतिम महाआरती संपन्न होते ही मुख्य पुजारी और सेवादार पूरे परिसर को खाली कर देते हैं. मंदिर के भारी कपाट बंद कर दिए जाते हैं और सभी लोग परिसर से दूर चले जाते हैं. लोक-मान्यताओं के अनुसार, रात के अंधकार में स्वयं मां वन देवी अपनी गुप्त शक्तियों के साथ इस पूरे वन और मंदिर परिसर में विचरण करती हैं. यह समय केवल दैवीय शक्तियों के लिए आरक्षित माना गया है, और इस मर्यादा को तोड़ने का दुस्साहस आज तक किसी ने नहीं किया.
मन्नत मांगने की अनोखी परंपरा
मां वन देवी को बिहटा और इसके आस-पास के दर्जनों गांवों की संरक्षक देवी माना जाता है. यहां मन्नत मांगने की एक प्राचीन और सीधी विधि है. एक मुट्ठी साबुत चावल, एक लाल गुड़हल का फूल और एक सिक्का. कहा जाता है कि मां के दरबार से आज तक कोई भी भक्त खाली हाथ वापस नहीं लौटा है. विशेषकर शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ता है.
निष्कर्ष
फिल्मी दुनिया में कहानियों को चाहे जिस भी ड्रामेटिक अंदाज़ में पेश किया जाए, लेकिन धरातल पर सनातन धर्म की ये आस्थाएं और परंपराएं पूरी तरह अडिग हैं. बिहटा का मां वन देवी मंदिर आज भी अपनी अलौकिक शक्ति और आस्था के लिए प्रसिद्ध है.




