रहस्यमयी है उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर: जहां राजा विक्रमादित्य ने 11 बार चढ़ाया था अपना शीश

जब भगवान शिव सती की पार्थिव देह लेकर ब्रह्मांड में तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 भाग किए थे. मान्यताओं के अनुसार, उज्जैन में देवी सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी, जिसके कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ.

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उज्जैन: महाकाल की नगरी उज्जैन न केवल ज्योतिर्लिंग के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां स्थित श्री हरसिद्धि माता शक्तिपीठ आस्था, इतिहास और चमत्कारों का एक ऐसा केंद्र है, जो विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर देता है. 51 शक्तिपीठों में 13वें स्थान पर स्थित यह मंदिर सम्राट विक्रमादित्य की अनन्य भक्ति और माता के अलौकिक प्रताप की गवाही देता है.

शक्तिपीठ की उत्पत्ति और पौराणिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव सती की पार्थिव देह लेकर ब्रह्मांड में तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 भाग किए थे. मान्यताओं के अनुसार, उज्जैन में देवी सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी, जिसके कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ. स्कंद पुराण के अनुसार, हर (महादेव) के कार्यों को सिद्ध करने वाली होने के कारण इन्हें हरसिद्धि कहा जाता है. माता चंडी ने महादेव के आदेश पर ही कैलाश में प्रवेश करने वाले असुरों चंड और प्रचंड का संहार किया था, जिसके बाद महादेव ने उन्हें हरसिद्धि नाम से पूजे जाने का वरदान दिया.

सम्राट विक्रमादित्य का 11 बार शीश बलिदान

यह मंदिर सम्राट विक्रमादित्य की कठोर तपस्या का साक्षी है. इतिहास और लोक कथाओं के अनुसार, विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के अनन्य भक्त थे. वे हर 12 साल के अंतराल पर देवी को प्रसन्न करने के लिए अपना सिर काटकर बलि चढ़ाते थे. मां की कृपा से उनका सिर पुनः जुड़ जाता और उन्हें नया जीवन प्राप्त होता. उन्होंने ऐसा कुल 11 बार किया. 12वीं बार में माता ने उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया. मंदिर प्रांगण में रखे 11 सिंदूरी शीश आज भी इस अकल्पनीय त्याग की कहानी सुनाते हैं.

51 फीट ऊंचे दीप स्तंभों का चमत्कार

मंदिर के आंगन में मराठा स्थापत्य कला के दो विशाल 51 फीट ऊंचे दीप स्तंभ हैं, जो लगभग 2000 साल पुराने माने जाते हैं. इन पर 1011 से 1111 तक दीपक लगे हुए हैं. शाम की महाआरती के दौरान, प्रशिक्षित सेवक मात्र 7 मिनट में इन सभी दीपों को प्रज्वलित कर देते हैं. लगभग 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई की बत्तियों से जब ये स्तंभ जगमगाते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों.

मां हरसिद्धि और गुजरात का नाता

मान्यता है कि महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध के वध से पूर्व इन्हीं देवी की पूजा की थी, तब देवी गुजरात के कोयला डूंगर में विराजती थीं. सम्राट विक्रमादित्य की तपस्या से प्रसन्न होकर माता उनके साथ उज्जैन आईं. उन्होंने शर्त रखी थी कि वे दिन में कोयला डूंगर और संध्या होते ही उज्जैन में रहेंगी. यही कारण है कि उज्जैन में संध्या आरती का महत्व अत्यंत अधिक है.

गर्भगृह और तंत्र साधना

मंदिर का गर्भगृह तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है. यहां मां महालक्ष्मी, मां हरसिद्धि और मां महासरस्वती की प्रतिमाएं ऊर्ध्वाधर (vertical) रूप में स्थापित हैं. गर्भगृह के सामने फर्श पर सिद्ध श्री यंत्र स्थापित है, जिसके दर्शन मात्र से भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं. यहां माता को बेसन, शुद्ध घी के लड्डू और मावे की बर्फी का भोग लगाया जाता है. यदि आप उज्जैन की यात्रा पर हैं, तो महाकाल दर्शन के साथ ही माता हरसिद्धि के दर्शन और दीप स्तंभों की दिव्य लौ को निहारना न भूलें. यह अनुभव आपकी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्णता प्रदान करता है.

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