महाभारत का सबसे बड़ा रहस्य: कृष्ण का सुदर्शन चक्र और पाञ्चजन्य शंख कहां से आए?

आमतौर पर लोग मानते हैं कि सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का ही एक हिस्सा है. लेकिन पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर शिव पुराण के अनुसार, इसकी उत्पत्ति भगवान शिव के महातेज से हुई थी.

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महाभारत के युद्ध में एक तरफ दुनिया के सबसे बड़े महारथी थे और दूसरी तरफ बिना कोई हथियार उठाए खुद भगवान श्रीकृष्ण. पूरे युद्ध में श्री कृष्ण ने कोई शस्त्र नहीं उठाया सिवाय एक बार, जब भीष्म पितामह को रोकने के लिए उन्होंने रथ का पहिया उठा लिया था. लेकिन अगर कृष्ण हथियार उठा लेते, तो उनके पास ऐसे दिव्य अस्त्र थे जो पलक झपकते ही पूरी सृष्टि को भस्म कर सकते थे. जिसका डर कौरवों को बार-बार सताता था.

सुदर्शन चक्र: महादेव की तपस्या और ‘कमल-नयन’ का त्याग

आमतौर पर लोग मानते हैं कि सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का ही एक हिस्सा है. लेकिन पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर शिव पुराण के अनुसार, इसकी उत्पत्ति भगवान शिव के महातेज से हुई थी. पौराणिक कथा के अनुसार, जब दैत्यों का अत्याचार सीमा से अधिक बढ़ गया, तो भगवान विष्णु मदद मांगने महादेव के पास गए. महादेव उस समय गहन समाधि में थे. भगवान विष्णु ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की और प्रतिदिन उन्हें 1,000 कमल के फूल अर्पित करने लगे.विष्णु जी की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए शिव जी ने एक दिन एक कमल का फूल छिपा दिया. जब विष्णु जी ने देखा कि एक फूल कम है, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी एक आंख जिसे कमल-नयन कहा जाता है निकालकर शिव जी के चरणों में अर्पित कर दी. इस परम त्याग से अत्यंत प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए और उन्होंने अपने तेज से एक अद्वितीय अस्त्र का निर्माण किया, जिसे सुदर्शन चक्र कहा गया.

प्राचीन काल की पहली ‘माइंड-कंट्रोल मिसाइल’

शास्त्रों के अनुसार, चक्र के परिधि पर 108 अत्यंत तीव्र धारदार आरेख थे. इसके आंतरिक तंत्र में दो थ्रस्टर्स जैसी ऊर्जा व्यवस्था थी, जिससे यह हवा में बिना किसी सहारे के तैरता था. कृष्ण के मन में सोचते ही यह अस्त्र अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर देता था. यह अस्त्र शत्रु का तब तक पीछा करता था जब तक उसका संपूर्ण विनाश न हो जाए, और कार्य पूरा करके पुनः स्वामी की उंगली पर लौट आता था.

पाञ्चजन्य शंख: गुरुदक्षिणा में मिली दिव्य शक्ति

भगवान कृष्ण के पास केवल चक्र ही नहीं था, बल्कि उनके पास एक ऐसा शंख भी था जिसकी गूंज से शत्रुओं के हृदय थर-थर कांप उठते थे. इस शंख का नाम था—पाञ्चजन्य. इसकी प्राप्ति की कथा महर्षि सांदीपनि के आश्रम से जुड़ी है, जब कृष्ण शिक्षा ग्रहण करने के लिए सांदीपनि आश्रम गए थे.. इस दौरान श्री कृष्ण के गुरू पुत्र समुद्र में डूब गए. कृष्ण ने गुरुदक्षिणा के रूप में गुरुपुत्र को सजीव वापस लाने का संकल्प लिया. इसी समुद्र की गहराइयों में पंचजन नामक एक भयंकर असुर रहता था, जो विशाल शंख के रूप में निवास करता था. श्री कृष्ण ने उस असुर का संहार किया और उसके शरीर से यह दिव्य पाञ्चजन्य शंख प्राप्त किया. महाभारत के कुरुक्षेत्र में जब भी यह शंख बजता था, तो कौरव सेना का मनोबल टूट जाता था और युद्धभूमि में भय का वातावरण व्याप्त हो जाता था.

द्वापर युग के बाद कहां गए ये दिव्य अस्त्र?

महाभारत युद्ध के पश्चात, जब भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मानव लीला पूर्ण की और बैकुंठ धाम लौटे, तो सुदर्शन चक्र और पाञ्चजन्य शंख भी उनके साथ ही अंतर्ध्यान हो गए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये दिव्य अस्त्र आज भी अदृश्य व सुरक्षित रूप में विद्यमान हैं. जब कलयुग के अंत में अधर्म अपनी चरम सीमा पर होगा और भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होगा, तब ये अस्त्र एक बार फिर से प्रकट होकर संसार में अधर्म का नाश करेंगे.

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