संकेत वन: ब्रजमंडल का वो महा-रहस्य, जहां आज भी महसूस होती है कान्हा की धड़कन!

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वृंदावन के निधिवन के रहस्यों से तो पूरी दुनिया वाकिफ है, लेकिन ब्रजभूमि की चौरासी कोस की पावन परिधि में एक ऐसा गुप्त और अत्यंत अलौकिक स्थान भी मौजूद है, जिसके बारे में आम जनमानस में बहुत कम चर्चा होती है। बरसाना से लगभग 4 किलोमीटर दूर नंदगांव मार्ग पर स्थित संकेत वन और इसके केंद्र में स्थापित श्री संकेत बिहारी मंदिर अपने भीतर अध्यात्म, इतिहास और अनसुलझे रहस्यों का एक ऐसा अनूठा संसार समेटे हुए है, जिसे जानकर आधुनिक वैज्ञानिक और डॉक्टर भी हैरान हैं।

द्वापर युग का ऐतिहासिक गवाह: सनातन ग्रंथों और स्थानीय इतिहास के अनुसार, आज से लगभग साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व द्वापर युग के अंत में, जब श्रीकृष्ण नंदगांव से गाय चराने निकलते थे, तब वे इसी मार्ग से गुजरते थे। वहीं दूसरी ओर, बरसाना से लाडली जी (श्री राधा रानी) अपनी सखियों के संग पुष्प चुनने और लुका-छिपी खेलने इसी सघन वन में आती थीं। इसी पावन स्थल पर दोनों का वो दिव्य प्रथम महा-मिलन संपन्न हुआ था, जिसने ब्रह्मांडीय प्रेम की परिभाषा ही बदल दी।

इशारों और दर्पणों से होता था गुप्त संवाद: अक्सर भक्तों के मन में यह सवाल उठता है कि इस पावन वन का नाम ‘संकेत’ ही क्यों पड़ा? ‘बृहद भागवत’ और गोस्वामी संप्रदाय के शास्त्रों के अनुसार, द्वापर युग में लोक-लाज के कारण राधा-कृष्ण सीधे संवाद नहीं करते थे। वे अपनी अंतरंग सखियों और विशेषकर वृंदा देवी (योगमाया) के माध्यम से विशेष संकेतों द्वारा गुप्त मिलन की रूपरेखा तैयार करते थे। श्रीकृष्ण ग्वाल-बालों के बीच से ही अत्यंत सूक्ष्म शारीरिक हाव-भावों से इशारा करते थे। कभी कान में लगे पुष्प को निकालकर दूसरे कान पर लगा लेना, तो कभी भौंहों को टेढ़ा करना। मान्यता तो यह भी है कि जब राधा जी बरसाना में और श्रीकृष्ण नंदगांव की पहाड़ियों पर होते थे, तब वे दर्पणों (शीशों) के परावर्तन के माध्यम से एक-दूसरे को प्रकाश के गुप्त संकेत भेजते थे। संकेत वन आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के अतिरिक्त कई अन्य पवित्र स्थल भी आकर्षण का केंद्र हैं:

  1. श्री संकेतमाता (योगमाया माता) मंदिर: प्राचीन राजवंशों के समय का मंदिर।
  2. श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी का भजन कुटीर: जहां उन्होंने वर्षों तपस्या की।
  3. श्री कृष्ण कुंड व श्री विह्वल कुंड: पावन स्नान क्षेत्र, जहां भक्तों को असीम शांति की अनुभूति होती है।

नीली साड़ी और काली कस्तूरी का अलौकिक प्रसंग

कहा जाता है कि इस महामिलन की शुरुआत उस पूर्वराग से हुई थी जब दोनों ने एक-दूसरे को साक्षात देखे बिना ही मन में अगाध प्रेम स्थापित कर लिया था। कालिया दमन के दिन श्रीकृष्ण ने पहली बार यमुना किनारे राधा जी को देखा था, वहीं राधा जी ने पूर्णिमासी देवी के मुख से केवल ‘कृष्ण’ नाम सुनकर उन्हें स्वप्न में देखा था। इस तड़प को शांत करने के लिए पूर्णिमासी देवी ने कृष्ण पक्ष की घनी अंधेरी रात में दोनों के मिलन की योजना इसी वन में बनाई। लोक-लाज और परिजनों से बचने के लिए, राधा जी ने अपने गोरे शरीर पर काली कस्तूरी का लेप लगाया और नीले रंग की साड़ी पहनकर रात्रि के अंधकार में विलीन होकर यहाँ पहुँची थीं।

खतरनाक है रात का सन्नाटा

ब्रज की सनातन नित्य-लीला की अवधारणा के अनुसार, राधा और कृष्ण आज भी योगमाया के प्रभाव से इस वन में सूक्ष्म रूप से नित्य क्रीड़ा करते हैं। यहाँ के पेड़ अत्यंत विचित्र हैं, जिनकी शाखाएं ऊपर आसमान की ओर बढ़ने के बजाय नीचे की ओर झुककर भूमि को स्पर्श करती हैं। मान्यता है कि ये पेड़ द्वापर युग की गोपियां हैं, जो हर रात महारास के समय चेतन रूप धारण कर लेती हैं। यही वजह है कि संकेत वन में सूर्यास्त के पश्चात रुकने की पूरी तरह मनाही है। संध्या की आरती के बाद मनुष्य तो दूर, पशु-पक्षी और बंदर भी इस वन क्षेत्र को खाली करके बाहर चले जाते हैं। स्थानीय बुजुर्गों का दावा है कि जिसने भी हठपूर्वक रात में यहां रुकने या उस महारास को देखने का प्रयास किया, वो इस ईश्वरीय ऊर्जा के तेज को सहन नहीं कर पाया और या तो अंधा हो गया, पागल हो गया, या फिर उसकी मृत्यु हो गई। ‘गोविंद-लीलामृत’ के अनुसार, सुबह होते ही जब ‘कक्खटी’ नामक वृद्ध बंदरिया राधा जी की सास जटिला का नाम पुकारती है, तब दोनों संकोचवश झटपट अपने-अपने घरों की ओर लौट जाते हैं।

राजा वज्रनाभ से लेकर चैतन्य महाप्रभु तक का इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार, राजा वज्रनाभ (श्रीकृष्ण के प्रपौत्र) ने ब्रज के जिन पांच स्थानों पर प्राचीन झूले (jhoola) बनवाए थे, उनमें से एक यहां स्थित है। उन्होंने ही यहां श्री संकेत देवी मंदिर और एक खुला सभागार बनवाया था। बाद में 15वीं शताब्दी में, गौड़ीय संप्रदाय के प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस स्थान का पुनरुद्धार किया। उनके शिष्य श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी ने यहां तपस्या कर श्री राधा संकेत बिहारी जी के विग्रह प्रकट किए, जो आज भी मंदिर में विराजमान हैं। वर्तमान में, वर्ष 1995 से सेर श्री श्याम दास बाबा और उनके शिष्य (श्री श्री १००८ कृपा सिंधु दास महाराज के मार्गदर्शन में) यहां नि:स्वार्थ सेवा और एक विशाल गौशाला का संचालन कर रहे हैं। यहां आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए मंदिर परिवार की ओर से रहने और भोजन (प्रसाद) की नि:शुल्क व्यवस्था की जाती है। जीवंत परंपरा के रूप में, आज भी बरसाना की लट्ठमार होली खेलने से पहले नंदगांव के हुरियारे इसी मंदिर में आकर माथा टेकते हैं।

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