आमेर: राजस्थान के जयपुर जिले के ऐतिहासिक कस्बे आमेर में स्थित 17वीं शताब्दी का जगत् शिरोमणि मंदिर भारतीय संस्कृति और भक्ति परंपरा की एक अनूठी मिसाल है. यह मंदिर दुनिया भर में इसलिए खास माना जाता है क्योंकि यह संभवतः देश के उन चुनिंदा मंदिरों में शामिल है, जहां भक्ति काल की महान कवयित्री और कृष्ण की परम जोगन मीरा बाई की पूजा भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु के साथ एक ही गर्भगृह में की जाती है.
पुत्र की स्मृति में रानी कनकवती ने कराया था निर्माण
इस भव्य मंदिर का निर्माण कछवाहा राजवंश के राजा मानसिंह प्रथम की महारानी कनकवती ने वर्ष 1599 से 1608 ईस्वी के मध्य करवाया था. महारानी ने अपने अल्पायु में दिवंगत हुए पुत्र जगत् सिंह की पावन स्मृति में इसका निर्माण कराया, जिसके कारण इस मंदिर का नाम जगत् शिरोमणि पड़ा. स्थानीय जनश्रुतियों और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति वही प्रतिमा है, जिसकी पूजा मीरा बाई स्वयं मेवाड़ (चित्तौड़गढ़) में किया करती थीं. मुगलों के आक्रमण और सुरक्षा के खतरों को देखते हुए इस पवित्र मूर्ति को आमेर लाया गया और बाद में पूर्ण विधि-विधान के साथ इस मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया.
नागर शैली और मुग़ल वास्तुकला का संगम
मंदिर का निर्माण स्थानीय लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से हुआ है. यह नागर शैली और मुग़ल वास्तुकला के सुंदर समन्वय का बेहतरीन नमूना है. मंदिर के विशाल खंभे, तोरण द्वार, गुंबद और गर्भगृह पर उकेरी गई हिंदू देवी-देवताओं, पौराणिक आकृतियों, संगीतकारों तथा संगमरमर की बारीकी से की गई नक्काशी तत्कालीन उत्कृष्ट हस्तशिल्प को दर्शाती है. भक्ति आंदोलन के इतिहास में इस मंदिर का एक विशेष स्थान है. यह श्रीकृष्ण भक्तों, मीरा के अनुयायियों और इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है. विद्वान इसे मीरा और कृष्ण के आध्यात्मिक संबंध का एक दुर्लभ प्रतीक मानते हैं. जन्माष्टमी और अन्य धार्मिक उत्सवों के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ता है, जहां मीरा बाई के पद और कृष्ण भजनों से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठता है.




