चुनाव आयोग पर घमासान: राहुल गांधी ने लगाया मैच फिक्सिंग का आरोप, ममता बोलीं- ‘वैनिश कुमार’

ममता बनर्जी ने तंज कसते हुए उन्हें 'वैनिश कुमार' की संज्ञा दे दी. इस कड़ी में टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने बयान दिया कि सिर्फ 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) ही सीईसी ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटा सकती है.

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नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव और निर्वाचन आयोग के हालिया फैसलों को लेकर सियासी पारा काफी चढ़ गया है. चुनाव आयोग (ECI) के भीतर आयुक्तों के आपसी मतभेदों और एसआईआर (SIR) विवाद के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार विपक्षी दलों के निशाने पर आ गए हैं.

विपक्ष का तीखा हमला: राहुल और ममता के कड़े तेवर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार का इस्तेमाल भाजपा के लिए लोगों को जोड़ने में किया गया और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें मुख्य अंपायर बनाकर देश के चुनावी सिस्टम में मैच फिक्सिंग का जिम्मा सौंप दिया. वहीं, पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तंज कसते हुए उन्हें ‘वैनिश कुमार’ की संज्ञा दे दी. इस कड़ी में टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने बयान दिया कि सिर्फ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ही सीईसी ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटा सकती है. उन्होंने कहा कि यदि सीJP की तरफ से कोई ठोस कदम उठाया जाए, तभी यह संभव है, क्योंकि कोई अन्य राजनीतिक दल ऐसा करने में सक्षम नहीं है. इन तमाम मुद्दों पर रणनीति तैयार करने के लिए विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (I.N.D.I.A) ब्लॉक ने आगामी 30 सितंबर को नई दिल्ली में एक अहम बैठक बुलाई है. इस मीटिंग में कांग्रेस, टीएमसी और सीपीएम समेत कई प्रमुख दलों के शामिल होने के पूरे आसार हैं.

भाजपा का बचाव और विपक्ष का पलटवार

दूसरी तरफ, भाजपा नेता समिक भट्टाचार्य ने बंगाल की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य के नागरिकों ने लंबे अरसे बाद ऐसा चुनाव अनुभव किया है, जहां किसी प्रकार का डर नहीं था. उन्होंने कहा कि लोगों को अपने मताधिकार का खुलकर प्रयोग करने का मौका मिला और इस दौरान हिंसा की कोई बड़ी घटना सामने नहीं आई. भट्टाचार्य ने दावा किया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में ज्ञानेश कुमार की भूमिका सराहनीय रही है, जिसके तहत सीमावर्ती राज्य बंगाल में वोटर लिस्ट से विदेशी घुसपैठियों के नाम बाहर किए गए. समिक भट्टाचार्य के इस बयान पर विपक्षी खेमे की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं. शिवसेना (UBT) नेत्री प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि एक अनुभवी नेता से इस तरह के बयानों की उम्मीद नहीं थी, शायद यह बंगाल में भाजपा की सफलता पर आभार जताने का तरीका हो. वहीं, आरजेडी सांसद मनोज झा ने चुटकी लेते हुए कहा कि ऐसी सोच के लिए समिक भट्टाचार्य को देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए, क्योंकि चोरी और धांधली के दावों के बीच इस तरह के विचार रखना अनोखा है.

3 दशक बाद ममता और एमए बेबी की बातचीत

मौजूदा राजनीतिक हलचल के बीच, पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी और सीपीएम (CPI-M) के महासचिव एमए बेबी के बीच फोन पर लंबी चर्चा हुई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब तीस साल के लंबे अंतराल के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली सीधी बातचीत हुई है. दरअसल, एमए बेबी ने हाल ही में गैर-एनडीए दलों को पत्र लिखकर चुनाव आयोग और एसआईआर के मामले पर विपक्षी दलों की एक संयुक्त बैठक आयोजित करने का आह्वान किया था. सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी ने इस पत्र का जवाब देने के साथ-साथ फोन पर भी बातचीत की. उन्होंने राहुल गांधी के साथ हुई अपनी चर्चा का हवाला देते हुए विपक्षी गठबंधन की बैठक जल्द बुलाए जाने पर जोर दिया. हालांकि सीपीएम और टीएमसी बंगाल की राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया’ ब्लॉक के तहत दोनों का आमने-सामने आना सियासी समीकरणों में एक नया मोड़ माना जा रहा है.

SIR विवाद और चुनाव आयोग के भीतर मतभेद

यह पूरा विवाद मुख्य रूप से चुनाव आयोग के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) से जुड़ा हुआ है. मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि आयोग के दो अन्य आयुक्तों ने पिछले कुछ महीनों में कई बड़े फैसलों पर 14 बार अपनी असहमति जताई थी, लेकिन उनकी आपत्तियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. कांग्रेस पार्टी का यह आरोप है कि ज्ञानेश कुमार आयोग के भीतर अपनी मनमानी चला रहे हैं और बाकी सदस्यों की राय को नजरअंदाज कर रहे हैं. इसी के विरोध में कांग्रेस ने देशव्यापी प्रदर्शन करते हुए ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है. इसके अलावा, चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ सॉफ्टवेयर बदलावों और आदेशों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दायर की गई हैं.

चुनाव आयुक्तों के वे चार बड़े सवाल, जिन पर मचा है बवाल:

  1. फॉर्म-6 में संशोधन: नए मतदाताओं से पुरानी एसआईआर सूची में खुद या परिवार के सदस्यों के नाम का विवरण मांगने को लेकर सवाल उठाए गए. आयोग के एक सदस्य ने इसे नियम विरुद्ध बताते हुए हटाने की बात कही थी.
  2. वोटर डेटा पर सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल: वोटर डेटाबेस का नियंत्रण पूरी तरह दिल्ली के पास केंद्रित होने और राज्यों की पहुंच सीमित किए जाने पर आपत्ति जताई गई.
  3. बंगाल में लाखों अपीलें: यह सवाल भी उठा कि पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों को लेकर करीब 16 लाख अपीलें आखिर किसकी अनुमति से और किसने दाखिल कीं.
  4. गोवा के मतदाता: तकनीकी खराबी या सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी के कारण गोवा के 97 ऐसे मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में नहीं जुड़ सके, जिन्हें जांच के दौरान पूरी तरह योग्य पाया गया था.

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