कॉफी के बागानों से बर्फीली चमक तक, Bhawani Thekkada Nanjunda की वो जीत, जिसने दक्षिण भारत को ‘बर्फ’ से प्यार करना सिखाया

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Bhawani Thekkada Nanjunda

जिस देश में बर्फ को सिर्फ हसीन ख्वाब माना जाता है, वहां एक लड़की ऐसी भी है जिसने अपनी पहली सर्दी ‘उधार’ ली थी। कर्नाटक के कोडागु (कुर्ग) की लाल मिट्टी और कॉफी की खुशबू के बीच पली-बढ़ी Bhawani Thekkada Nanjunda ने आज गुलमर्ग में वो कर दिखाया, जिसकी कल्पना उनके भूगोल में मुमकिन नहीं थी। समुद्र तल से 8700 फीट की ऊंचाई पर, एक कॉफी किसान की 30 वर्षीय बेटी आज विंटर गेम्स की ‘स्प्रिंट क्वीन’ बन गई है।

23 साल की उम्र में पहली बार देखी बर्फ, आज जीता ‘सोना’

किस्सा थोड़ा फिल्मी है। भवानी जब 23 साल की थीं, तब उन्होंने पहली बार अपनी हथेलियों पर बर्फ की ठंडक महसूस की थी। उससे पहले बर्फ उनके लिए सिर्फ टेलीविजन या फिल्मों का हिस्सा थी। लेकिन मंगलवार को जब उन्होंने 1.5 किमी की नॉर्डिक स्प्रिंट में फिनिश लाइन पार की, तो यह सिर्फ एक रेस की जीत नहीं थी। यह जीत थी उस संदेह के खिलाफ कि “क्या दक्षिण भारत का कोई बच्चा स्कीइंग कर सकता है?” भवानी ने इस सीजन में दो कांस्य पदक जीतने के बाद आज आखिरकार अपनी झोली में स्वर्ण पदक डाल ही लिया।

एक पिता का भरोसा और ‘ये जवानी है दीवानी’ का वो सपना

भवानी की सफलता के पीछे कोडागु के एक कॉफी किसान पिता का अटूट विश्वास है। जब भवानी ने विंटर स्पोर्ट्स को अपना करियर चुना, तो उनके घर के आसपास न कोई बर्फीला ट्रैक था और न ही क्रॉस-कंट्री स्कीइंग का माहौल। लेकिन उनके पिता ने उनकी आंखों में छिपी उस ‘जिद’ को पहचान लिया था। भवानी बताती हैं, “फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में पहाड़ों को देखकर मैंने बड़े सपने बुने थे। सिनेमा ने मुझे पहाड़ों की झलक दिखाई, लेकिन जिंदगी ने मांग की कि मैं उन्हें फतह करूं।” भवानी के लिए सबसे भावुक लम्हा तब आया जब उन्होंने गोल्ड जीतने के बाद कहा, “मम्मी-पापा ने कभी बर्फ नहीं देखी। मैं चाहती हूं कि वे एक दिन गुलमर्ग आएं और मुझे इस बर्फ पर जीतते हुए देखें।”

बाधाओं को चीरकर बनीं मिसाल: चिली से कजाकिस्तान तक की तैयारी

भवानी का सफर आसान नहीं था। आर्थिक तंगी, ट्रेनिंग के लिए घर से हजारों किलोमीटर की दूरी और बुनियादी सुविधाओं की कमी—ये सब उनके रास्ते में आए। लेकिन भवानी रुकी नहीं। वह चिली में 2025 एफआईएस (FIS) दक्षिण अमेरिका कप में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। खेलो इंडिया विंटर गेम्स के सभी 6 संस्करणों में भाग लेने वाली भवानी आज रिलायंस फाउंडेशन के सहयोग से देश की उन 6 लड़कियों में शामिल हैं, जो विंटर स्पोर्ट्स में भारत का भविष्य हैं।

जब ‘सर्दी’ किताबों से निकलकर हकीकत बन गई

भवानी थेकेडा नंजुंडा की यह जीत हमें याद दिलाती है कि प्रतिभा किसी विशेष क्षेत्र की मोहताज नहीं होती। अगर एक लड़की 23 साल की उम्र में पहली बार बर्फ देखकर 30 की उम्र में ‘स्प्रिंट क्वीन’ बन सकती है, तो सोचिए सही सुविधाओं के साथ हमारे युवा क्या नहीं कर सकते। भवानी की नजर अब 2029 के कजाकिस्तान एशियाई शीतकालीन खेलों पर है।

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