Khelo India Winter Games 2026: जब गुलमर्ग की पहाड़ियों पर आखिरी दिन सूरज चमक रहा था, तो मुकाबला सिर्फ मेडल का नहीं, बल्कि साख का भी था। एक तरफ भारतीय सेना के जांबाज थे जो हर ढलान को फतह करने के आदी हैं, और दूसरी तरफ वो स्थानीय युवा थे जिनके लिए ये बर्फ उनका घर है। खेलो इंडिया विंटर गेम्स 2026 के आखिरी दिन सेना ने अपनी बादशाहत बरकरार रखते हुए टीम चैंपियनशिप की ट्रॉफी तो अपने पास रखी, लेकिन दिन की सबसे भावुक कहानी मेजबान जम्मू-कश्मीर और हिमाचल की बेटियों ने लिखी।
जब जुबैर की स्की ने काटा सन्नाटा और गूंज उठा ‘कश्मीर’
मेजबान जम्मू-कश्मीर के लिए इस बार के खेल थोड़े फीके रहे थे। दो दिन बीत चुके थे, लेकिन गोल्ड मेडल की तलाश खत्म नहीं हो रही थी। बुधवार को जब जुबैर अहमद लोन अपनी स्नोबोर्डिंग स्की लेकर ढलान पर उतरे, तो उनके ऊपर सिर्फ अपनी जीत का नहीं, बल्कि पूरे राज्य की उम्मीदों का बोझ था। मुकाबला कड़ा था—सामने सेना के विवेक राणा थे जो बिजली की रफ्तार से बर्फ काट रहे थे। लेकिन जुबैर ने उस दिन हारना नहीं सीखा था। उन्होंने महज एक सेकंड के मामूली अंतर से विवेक को पीछे छोड़कर जब फिनिश लाइन पार की, तो पूरा गोल्फ कोर्स तालियों से गूंज उठा। यह सिर्फ एक गोल्ड नहीं था, यह मेजबान टीम की साख बचाने वाली जीत थी, जिसने जम्मू-कश्मीर को पदक तालिका में 10वें नंबर पर खड़ा कर दिया।
भवानी का ‘सिक्सर’ और हिमाचल की प्रीति का दोहरा प्रहार
खेलों की दुनिया में ‘कंसिस्टेंसी’ यानी निरंतरता की बात होती है और कर्नाटक की भवानी थेकेडा नंजुंडा इसकी मिसाल बन गई हैं। भवानी ने विंटर गेम्स के अब तक के सभी छह संस्करणों में हिस्सा लिया है और आज 1.5 किमी की स्प्रिंट में गोल्ड जीतकर उन्होंने साबित किया कि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। वहीं हिमाचल प्रदेश की प्रीति ठाकुर इस टूर्नामेंट की नई ‘स्टार’ बनकर उभरीं। प्रीति ने स्नोबोर्डिंग के दोनों बड़े इवेंट—स्लैलम और जाइंट स्लैलम—में गोल्ड मेडल अपने नाम किए। उनकी यह जीत बताती है कि हिमाचल की घाटियों में स्कीइंग सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि वहां की लड़कियों के सपनों का हिस्सा बन चुकी है।
सेना का अनुशासन और ‘स्लैलम मैन’ मयंक का जादू
भारतीय सेना के लिए ये गेम्स उनकी ट्रेनिंग और अनुशासन का एक और प्रदर्शन मात्र थे। सेना ने कुल 9 गोल्ड मेडल जीते, जिनमें से 8 तो अकेले गुलमर्ग की वादियों में आए। मयंक पंवार इस बार के ‘स्लैलम मैन’ कहलाए, जिन्होंने दो गोल्ड जीतकर सेना की झोली भर दी। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावशाली नजारा 15 किमी की नॉर्डिक स्कीइंग रेस में दिखा, जहां पहले तीन स्थानों पर सिर्फ और सिर्फ सेना के ही जवान थे। मोहम्मद अली ने जब गोल्ड जीता, तो उनके पीछे पद्मा और सनी ने फिनिश लाइन पार की। यह ‘क्लीन स्वीप’ इस बात का गवाह है कि दुर्गम इलाकों में सेना के कौशल का मुकाबला करना फिलहाल किसी भी राज्य के लिए टेढ़ी खीर है।
बर्फ, जज्बा और बदलता इंफ्रास्ट्रक्चर
भले ही सेना चैंपियन बनी हो और हिमाचल दूसरे नंबर पर रहा हो, लेकिन इन खेलों का सबसे बड़ा संदेश मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की उस बात में छिपा है जहाँ उन्होंने ‘आर्टिफिशियल स्नो’ का जिक्र किया। बदलते मौसम के बीच अगर हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने हैं, तो हमें कुदरत के भरोसे नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ना होगा। जुबैर, भवानी और प्रीति जैसे खिलाड़ियों ने अपना काम कर दिया है, अब बारी सिस्टम की है कि वो इन सितारों को ओलंपिक के लायक मंच दे।




