
आज जब हम सोमनाथ मंदिर के आधुनिक जीर्णोद्धार के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं, तो यह केवल एक देवालय की वर्षगांठ नहीं है, बल्कि उस अजेय भारत की हुंकार है जिसने सदियों के जख्मों को सहा, पर अपनी पहचान नहीं खोई। प्रभास पाटन के तट पर अरब सागर की लहरें आज भी उस अजेय सभ्यता के चरणों को पखार रही हैं, जिसकी नींव को हिलाने का दुस्साहस कई आक्रांताओं ने किया, लेकिन हर बार यह श्रद्धा की आग में तपकर कुंदन की तरह और चमक उठा।
पौराणिक वैभव: क्षमा और दर्शन का केंद्र
शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, सोमनाथ (सोम यानी चंद्रमा के भगवान) की स्थापना मानवीय अहंकार और फिर क्षमा के दर्शन का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रजापति दक्ष के श्राप से जब चंद्रमा का तेज घटने लगा, तब उन्होंने इसी तट पर महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया था। भगवान शिव ने प्रकट होकर चंद्रमा को श्राप मुक्त किया और यहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इतिहास गवाह है कि यह मंदिर समय के हर चक्र का साक्षी रहा है। मान्यता है कि इसे सत्य युग में चंद्रमा ने सोने से, त्रेता में रावण ने चांदी से, द्वापर में श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से और कलियुग में भीमदेव सोलंकी ने पत्थरों से बनवाया था।
रक्तरंजित इतिहास और वीरता के प्रतीक
सोमनाथ की वैभवशाली संपदा ने इसे विदेशी आक्रांताओं की आंखों की किरकिरी बना दिया।
महमूद गजनी (1026): 30 हजार घुड़सवारों के साथ आए गजनी ने मंदिर को लूटा और खंडित किया। 50 हजार भक्तों ने निहत्थे होकर भी मंदिर की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी।अलाउद्दीन खिलजी (1299), जफर खान (1395), महमूद बेगड़ा (1451) और औरंगजेब (1665 व 1706) ने इसे जमींदोज करने के कई प्रयास किए। लेकिन विध्वंस के इस काले अध्याय के बीच वीरता के सुनहरे पन्ने भी लिखे गए। मात्र 16 वर्ष की आयु में वीर हमीरजी गोहिल ने खिलजी की सेना के विरुद्ध मोर्चा खोला। आज भी मंदिर के शिखर पर ध्वज चढ़ाने से पहले हमीरजी के स्मारक पर नमन किया जाता है, जो उनके सर्वोच्च बलिदान का सम्मान है। उनके साथ वेग्दाजी भील जैसे वीरों का शौर्य भी सोमनाथ की मिट्टी में रचा-बसा है।
आधुनिक भारत का संकल्प और नेहरू-पटेल मतभेद
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन सोमनाथ उस समय भी खंडहर था। 13 नवंबर 1947 को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र जल हाथ में लेकर इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। हालांकि, यह राह राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ कहकर सरकारी धन के उपयोग का विरोध किया। तब महात्मा गांधी के सुझाव पर सोमनाथ ट्रस्ट बना और जनता के दान से निर्माण कार्य शुरू हुआ। के.एम. मुंशी ने इस अभियान का नेतृत्व किया। 11 मई 1951 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के विरोध के बावजूद ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की और ऐतिहासिक शब्द कहे:
“सोमनाथ की शक्ति, विध्वंस की शक्ति से हमेशा बड़ी है।”
विज्ञान और आध्यात्म का संगम: बाण स्तंभ का रहस्य
वर्तमान मंदिर मारू-गुर्जर शैली का अद्भुत नमूना है, लेकिन इसका सबसे बड़ा रहस्य बाण स्तंभ है। इस स्तंभ पर बना तीर दक्षिण ध्रुव (अंटार्कटिका) की ओर इशारा करता है। शिलालेख के अनुसार, सोमनाथ से दक्षिण ध्रुव तक समुद्र के बीच भूमि का एक भी टुकड़ा नहीं है। 10,000 किलोमीटर का यह अबाधित ज्योतिर्मार्ग इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वजों को वैश्विक भूगोल का सटीक ज्ञान था।
2026: स्वाभिमान का पर्व
वर्ष 2026 ऐतिहासिक है। यह गजनी के हमले के 1000 वर्ष और आधुनिक मंदिर के 75 वर्ष पूर्ण होने का संधि काल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज मनाया जा रहा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष है। सोमनाथ हमें सिखाता है कि पत्थरों को तोड़ा जा सकता है, लेकिन जनमानस की श्रद्धा और देश की आत्मा को नहीं। आज जब भक्त यहां शीश नवाते हैं, तो वे केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों के संघर्ष और विजय की गाथा के दर्शन करते हैं। सोमनाथ अजर है, अमर है।



