Amarnath Yatra 2026: 7 फीट से घटकर मात्र 1 फीट रह गए बाबा बर्फानी; जानें क्या है वजह?

57 दिनों तक चलने वाली इस लंबी धार्मिक यात्रा के शुरुआती दिनों में ही शिवलिंग का इस तरह पिघल जाना, प्रकृति की तरफ से एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. वहीं भक्तों में ये चिंता भी बनी हुई है कि कहीं समय से पहले ही बाबा अंतर्ध्यान न हो जाएं.

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अमरनाथ यात्रा 2026: 3 जुलाई से अमरनाथ यात्रा की शुरूआत हो गई है. जिसके बाद से बड़ी संख्या में लोग बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं. लेकिन इन लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक बेहद परेशान करने वाली खबर सामने आ रही है. इतनी कड़ी चुनौती के बीच जान हथेली पर लेकर जिस पवित्र हिम शिवलिंग के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से लोग कश्मीर पहुंच रहे हैं,उनके लिए ये खबर थोड़ी निराश करने वाली है. बाबा बर्फानी का आकार तेजी से सिमटता जा रहा है. सिर्फ कुछ ही दिनों में, 7 फीट की ऊंचाई वाला शिवलिंग घटकर मात्र 1 फीट रह गया है. इस साल अमरनाथ यात्रा रिकॉर्ड तोड़ रही है, लेकिन इसी भारी उत्साह के बीच बाबा बर्फानी के तेजी से पिघलने ने प्रशासन, पर्यावरणविदों और भक्तों की चिंता बढ़ा दी है.

दिन-ब-दिन घटता आकार: क्या कहते हैं आंकड़े?

अगर सरकारी और स्थानीय आंकड़ों पर नजर डालें, तो इस बार बाबा बर्फानी के आकार में बहुत तेजी से गिरावट आई है. यात्रा शुरू करने से पहले 23 मई को पवित्र हिम शिवलिंग की उंचाई लगभग 7 फीट मापी गई थी. जिसके बाद आधिकारिक तौर पर यात्रा शुरू करने तक यानी 29 जून तक आकार घटकर 4 फीट तक आ गया. अब ताजा तस्वीरों और रिपोर्ट्स के मुताबिक जो जानकारी आ रही है उसके हिसाब से बाबा बर्फानी का आकार अब केवल 1 फीट के आसपास ही बचा है. 57 दिनों तक चलने वाली इस लंबी धार्मिक यात्रा के शुरुआती दिनों में ही शिवलिंग का इस तरह पिघल जाना, प्रकृति की तरफ से एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. वहीं भक्तों में ये चिंता भी बनी हुई है कि कहीं समय से पहले ही बाबा अंतर्ध्यान न हो जाएं.

कैसे बनते हैं बाबा बर्फानी?

हर साल लाखों की संख्या में लोग बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए जाते हैं. एक ओर जहां लोग अपनी आस्था से परिपूर्ण ये मानते हैं कि हर साल भोलेनाथ स्वंय अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए साक्षात बाबा बर्फानी का रूप धारण कर आते हैं, तो वहीं इस अद्भुत प्राकृतिक कलाकृति को विज्ञान की भाषा में स्टैलेग्माइट (Stalagmite) कहा जाता है. इसकी बनने की प्रक्रिया कुछ इस तरह होती है. विज्ञान के मुताबिक अमरनाथ गुफा की छत पर मौजूद चूना पत्थर की दरारों से ग्लेशियर का पानी बूंद-बूंद करके नीचे टपकता है. गुफा के अंदर का तापमान बेहद कम होने के कारण यह पानी जमीन पर गिरते ही तुरंत जम जाता है. सालों से चली आ रही इस प्रक्रिया में पानी परत-दर-परत जमा होता जाता है और अंततः एक ठोस हिम शिवलिंग का आकार ले लेता है.

    क्यों इतनी तेजी से पिघल रहे हैं बाबा बर्फानी?

    इस बार हिमालयी क्षेत्रों में उम्मीद से ज्यादा गर्मी और मौसम में आ रहे अचानक बदलावों ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को पूरी तरह प्रभावित किया है. इसके पीछे दो मुख्य कारण होने की संभावना जताई जा रही हैं. पहली संभावना ये की पूरी दुनिया की तरह कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी औसत तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और गुफा के अंदर का तापमान वो नहीं रह गया है जो इसे लंबे समय तक बनाए रखने के लिए जरूरी है. दूसरी, यात्रा के दौरान गुफा के आसपास हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी, उनके चलने-फिरने और सांस छोड़ने से पैदा होने वाली बॉडी हीट भी गुफा के संवेदनशील पर्यावरण और तापमान को प्रभावित करती है. यात्रा अभी अपने शुरुआती चरण में है, ऐसे में बाबा बर्फानी का अंतर्ध्यान होने की कगार पर पहुंचना इस बात का सीधा संकेत है कि अब हमें प्रकृति और आस्था के बीच एक सही संतुलन बनाने की सख्त जरूरत है.

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