सनातन धर्म में पितृपक्ष और श्राद्ध का विशेष महत्व है. अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए जल, अन्न और पिंडदान देने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. लेकिन क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि आखिर इस प्रथा की शुरुआत कैसे हुई थी और इतिहास में वो पहला इंसान कौन था, जिसने सबसे पहले अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया था? आइए जानते हैं इसके पीछे की बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा.
महाभारत के अनुसार कैसे हुई श्राद्ध की शुरुआत?
महाभारत के अनुशासन पर्व के मुताबिक, श्राद्ध प्रथा की शुरुआत सबसे पहले महातपस्वी ऋषि अत्रि ने की थी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले उन्होंने ही महर्षि गौतम को श्राद्ध का महत्व और इसकी पूरी विधि समझाई थी. इसके बाद से ही सनातन परंपरा में अपने पूर्वजों की तृप्ति और आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करने का विधान शुरू हुआ.
धरती पर किसने किया था दुनिया का पहला श्राद्ध?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, ऋषि अत्रि के वंशज ऋषि निमि ने पृथ्वी पर सबसे पहले श्राद्ध कर्म किया था. कथा के अनुसार एक बार ऋषि निमि के पुत्र का अचानक असामयिक निधन हो गया. बेटे की मृत्यु के गहरे शोक से ऋषि निमि व्याकुल हो गए. इस दौरान उन्होंने अपने मृत पुत्र की आत्मा की शांति के लिए जंगल से कंद-मूल और फल एकत्र किए और पूरे आदर-भाव के साथ उनका भोग अपने पुत्र को समर्पित किया। इतिहास में इसे ही दुनिया का पहला श्राद्ध माना जाता है.
जब प्रकट हुए स्वयं भगवान ब्रह्मा और पितर देव
जब ऋषि निमि ने यह अनुष्ठान पूरी निष्ठा से किया, तो उनकी श्रद्धा को देख कर स्वयं पितर देव और भगवान ब्रह्मा वहां प्रकट हुए. भगवान ब्रह्मा ने ऋषि निमि को आशीर्वाद देते हुए कहा, हे निमि! आज से तुमने जो यह नई प्रथा शुरू की है, यह सनातन काल तक चलती रहेगी. जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ अपने पितरों के लिए अन्न और जल का दान करेगा, उसे न केवल उसके पितरों का, बल्कि संपूर्ण देवलोक का आशीर्वाद प्राप्त होगा.
क्यों पड़ा इसका नाम ‘श्राद्ध’?
शास्त्रों के अनुसार, इस अनुष्ठान का नाम ‘श्राद्ध’ इसलिए पड़ा, क्योंकि यह वो कर्म है जो पूरी ‘श्रद्धा’ के साथ अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए किया जाता है. आज भी पितृपक्ष के दौरान इसी पौराणिक परंपरा का पालन करते हुए लोग अपने पितरों को याद करते हैं और उनकी तृप्ति के लिए तर्पण व पिंडदान करते हैं.




