क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहां स्थापित गणेश प्रतिमा के सिर पर एक गहरा गड्ढा है? हैरान करने वाली बात यह है कि यह गड्ढा किसी प्राकृतिक वजह से नहीं, बल्कि लंकापति रावण के एक जोरदार मुक्के से बना था. इतना ही नहीं, इस एक प्रहार के कारण बप्पा के पैर हमेशा के लिए जमीन के अंदर धंस गए थे. आइए जानते हैं कर्नाटक के गोकर्ण में स्थित इस पौराणिक मंदिर की हैरान कर देने वाली कहानी.
कैकसी का हठ और रावण की कठोर तपस्या
कहानी की शुरुआत त्रेतायुग से होती है. रावण की माता कैकसी भगवान शिव की परम भक्त थीं और वे दुनिया का सबसे शक्तिशाली शिवलिंग आत्मलिंग पाना चाहती थीं. माता की इच्छा पूरी करने के लिए रावण ने महादेव की ऐसी कठोर तपस्या की कि दसों दिशाएं कांप उठीं. रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने अपना आत्मलिंग रावण को सौंप दिया. लेकिन, महादेव ने इसके साथ एक बेहद खतरनाक शर्त भी रख दी. रावण! तुम इसे लंका ले जा सकते हो, लेकिन याद रखना, रास्ते में इसे कहीं भी ज़मीन पर मत रखना. जहां तुमने इसे एक बार रख दिया, यह वहीं स्थापित हो जाएगा.
देवलोक में हड़कंप और विष्णु जी की ‘माया’
जैसे ही रावण आत्मलिंग लेकर लंका की ओर बढ़ा, देवलोक में हड़कंप मच गया. देवताओं को डर था कि अगर आत्मलिंग लंका पहुंच गया, तो रावण अमर और अजेय हो जाएगा. घबराकर सभी देव भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे. तब श्री हरि ने अपनी माया रची और सूर्य देव के सामने सुदर्शन चक्र रखकर समय से पहले ही सूर्यास्त (सांध्य काल) जैसा माहौल बना दिया. रावण नियमों का पक्का और परम सनातनी था. शाम ढलते देख उसे अपनी संध्या-वंदना करनी ही थी. लेकिन संकट यह था कि हाथ में आत्मलिंग था इसे जमीन पर रखे बिना पूजा कैसे हो?
चरवाहे बालक के रूप में बाल गणेश की एंट्री
तभी वहां ब्रह्मांड के सबसे चतुर देव भगवान गणेश एक छोटे चरवाहे बालक का रूप धरकर पहुंचे. रावण ने राहत की सांस ली और बालक से अनुरोध किया कि जब तक वह पूजा खत्म करके न आए, वह इस शिवलिंग को संभालकर रखे. लेकिन बाल गणेश ने तुरंत एक शर्त रख दी. गणेश जी ने रावण से कहा- यह शिवलिंग बहुत भारी है. मैं इसे तभी तक पकडूंगा जब तक मेरी ताकत जवाब नहीं देती. मैं तुम्हें सिर्फ तीन बार आवाज दूंगा, अगर तुम नहीं आए, तो मैं इसे यहीं ज़मीन पर रख दूंगा. रावण आचमन के लिए पानी के पास गया ही था कि गणेश जी ने बिना कोई वक्त गंवाए एक… दो… और तीन गिन फटाफट रावण को पुकार दिया. रावण जब तक दौड़कर वापस आता, गणेश जी ने आत्मलिंग को जमीन पर रख दिया. आत्मलिंग धरती में ऐसा समाया कि रावण अपनी पूरी ताकत लगाने के बाद भी उसे एक इंच नहीं हिला पाया.
गुस्से में रावण का मुक्का और धंस गए बप्पा के पैर
अपनी वर्षों की तपस्या को आंखों के सामने मिट्टी में मिलते देख रावण का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उसने आपा खो दिया और उस छोटे से बालक के सिर पर अपनी पूरी ताकत से एक घातक मुक्का जड़ दिया. रावण का वह प्रहार इतना भीषण था कि उसके दबाव से बाल गणेश के पैर सीधे जमीन के अंदर धंस गए.
आज भी मौजूद हैं 5 फीट ऊंची प्रतिमा पर वो निशान
जब रावण को अहसास हुआ कि वह बालक कोई और नहीं बल्कि स्वयं श्री गणेश थे, तो उसने अपनी भूल स्वीकार की और उनसे क्षमा मांगी. आज भी जब आप कर्नाटक के गोकर्ण में स्थित महा गणपति मंदिर जाएंगे, तो आपको वहां 5 फीट ऊंची काली ग्रेनाइट की गणेश प्रतिमा दिखेगी. ध्यान से देखने पर बप्पा के मस्तक पर रावण के मुक्के का वह गहरा गड्ढा साफ दिखाई देता है. इस प्रतिमा में गणेश जी के पैर गायब (ज़मीन में धंसे हुए) नज़र आते हैं.
मुख्य मंदिर से पहले दर्शन की परंपरा
युगों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, गोकर्ण के मुख्य महाबलेश्वर मंदिर (आत्मलिंग) में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालुओं के लिए इस महा गणपति मंदिर में दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है.




