त्रेतायुग की एक शांत और सुरम्य सुबह कैलाश पर्वत के अत्यंत एकांत कोने में देवाधिदेव महादेव अपनी आंखें मूंदे ध्यान की अनंत गहराइयों में लीन थे. उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक और सौम्य मुस्कान तैर रही थी. उनके कण्ठ से निरंतर एक ही नाम की ध्वनि गुंजायमान हो रही थी—”राम… राम… राम…” यह दृश्य देखकर जगज्जननी माता पार्वती कौतुहल से भर गईं. उन्होंने सहज और विनीत भाव से पूछा—”हे महादेव! आप तो स्वयं इस संपूर्ण सृष्टि के स्वामी, सर्वशक्तिमान और सबके आराध्य हैं. फिर आप किसका ध्यान कर रहे हैं? आपके लिए ईश्वर कौन है?. तब महादेव ने धीरे से अपनी आंखें खोलीं, मुस्कराए और मंद स्वर में बोले—”देवी, जिन्हें पूरी दुनिया ईश्वर मानती है, वे श्री राम… मेरे आराध्य हैं. शिव और राम का संबंध केवल दो महान देवताओं या शक्तियों का जुड़ाव मात्र नहीं है. यह प्रेम, भक्ति और समर्पण की वो अनोखी और सर्वोत्कृष्ट परिभाषा है, जिसे समझने में संपूर्ण ब्रह्मांड विस्मय में डूब जाता है.
रामेश्वरम का रहस्य: कौन किसका ईश्वर?
जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम रावण का वध करने और माता सीता को मुक्त कराने के लिए लंका की ओर बढ़े, तो समुद्र तट पर उन्होंने लंका विजय से पूर्व महादेव की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की. यही स्थल आज विश्व प्रसिद्ध रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है. लेकिन इस कथा की सबसे अद्भुत परत तो तब खुली, जब देवगणों ने कैलाश पर जाकर महादेव से पूछा—”हे प्रभु! रामेश्वरम शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है. शिवजी ने मंद-मंद मुस्कराते हुए उत्तर दिया—रामः यस्य ईश्वरः सः रामेश्वरः, अर्थात—राम जिसके ईश्वर हैं, वही रामेश्वर है. श्री राम कहते हैं कि शिव उनके भगवान हैं, और भगवान शिव घोषणा करते हैं कि राम उनके भगवान हैं. इस पावन संबंध के सामने आकर पूरा जगत मौन हो जाता है, क्योंकि यहां यह तय कर पाना ही असंभव है कि कौन भक्त है और कौन भगवान.
जब महादेव ने लिया हनुमान अवतार
इस अलौकिक प्रेम की पराकाष्ठा तब देखने को मिली, जब श्री हरि विष्णु ने त्रेतायुग में राजा दशरथ के गृह श्री राम के रूप में अवतार लिया. प्रभु राम का संपूर्ण जीवन संकटों, त्याग और वनवास की कठिनाइयों से भरा था. कैलाशपति शिव अपने आराध्य को विपत्तियों में घिरा देखकर चुपचाप कैसे बैठ सकते थे? उन्होंने सोचा मेरे प्रभु वन-वन भटकेंगे और मैं दूर बैठकर केवल देखता रहूंगा? नहीं, मुझे अपने प्रभु के पास जाना ही होगा. लेकिन श्री राम की मानव लीला की मर्यादा भंग न हो, इसलिए महादेव ने किसी राजा या अमर देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक सर्वसमर्पित दास के रूप में जाने का निर्णय लिया. महादेव ने अपने 11वें रुद्र अवतार में संकटमोचन श्री हनुमान के रूप में जन्म लिया. जो शिव संपूर्ण सृष्टि के काल हैं, जो स्वयं त्रिलोकपति हैं, वही शिव हनुमान के रूप में प्रभु राम के चरणों में बैठकर हाथ जोड़ते हैं.
हर कदम पर रुद्र का पहरा
जब-जब श्री राम पर कोई विपत्ति आई, शिव रूपी हनुमान हमेशा एक अजेय ढाल बनकर सबसे आगे खड़े रहे. जब रावण का अहंकार चरम पर था, तब हनुमान जी ने अकेले ही लंका का दहन कर राक्षस राज की नींव हिला दी. जब मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हुए, तो हनुमान जी पूरा द्रोणागिरी पर्वत ही उठाकर ले आए और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की. सीता माता की खोज से लेकर राम-रावण युद्ध के अंतिम क्षण तक, हनुमान जी ने अपनी हर सांस अपने प्रभु राम के नाम कर दी.
शिव और राम में भेद
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस बात को बड़े ही स्पष्ट और कड़े शब्दों में रेखांकित किया है. भगवान श्री राम स्वयं कहते हैं: शिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहुं नहि भावा॥ यानी, जो व्यक्ति शिव से बैर या द्वेष रखता है और स्वयं को मेरा भक्त कहता है, वह मुझे स्वप्न में भी प्रिय नहीं हो सकता. ठीक इसी तरह, जो श्री राम का अनादर करता है, उसकी कोई भी पूजा या भक्ति महादेव कभी स्वीकार नहीं करते.
प्रेम और भक्ति की अमर गाथा
राम ही शिव का हृदय हैं, और शिव ही राम की आत्मा हैं. यदि आप शिव को पाना चाहते हैं, तो राम का नाम जपना होगा और यदि आप राम की कृपा चाहते हैं, तो शिव की भक्ति में डूबना होगा. इन दोनों के बीच का यह संबंध हमें सिखाता है कि जहां सच्चा प्रेम और समर्पण होता है, वहां ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद समाप्त हो जाता है केवल भक्ति शेष रह जाती है.




