चिड़िया के रूप में जहां महर्षि ने की शिव पूजा: जानिए पाडी के ऐतिहासिक ‘तिरुकुडिल’ तिरुवल्लेश्वरर मंदिर की कहानी

महर्षि भारद्वाज ने वलियन(एक प्रकार की गौरैया या छोटी चिड़िया) का रूप धरकर यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. चिड़िया द्वारा पूजे जाने के कारण ही इस स्थान को वलितायम कहा गया.

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चेन्नई: तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के उत्तर-पश्चिमी इलाके पाडी में स्थित तिरुवलितायम तिरुवल्लेश्वरर मंदिर मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भक्ति, इतिहास और अनोखी पौराणिक मान्यताओं का संगम है. लगभग 1 एकड़ में फैले इस मंदिर का इतिहास चोल राजवंश से जुड़ता है. यह मंदिर 7वीं शताब्दी के शैव ग्रंथ तेवारम में वर्णित 275 पाडाल पेत्र स्थलम् में से एक माना जाता है, जहां भगवान शिव तिरुवल्लेश्वरर और देवी पार्वती जगदंबिका के रूप में विराजमान हैं.

नाम के पीछे छिपी है पौराणिक कथा

इस जगह का नाम तिरुवलितायम पड़ने के पीछे एक रोचक कथा है. मान्यता है कि महर्षि भारद्वाज ने वलियन(एक प्रकार की गौरैया या छोटी चिड़िया) का रूप धरकर यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. चिड़िया द्वारा पूजे जाने के कारण ही इस स्थान को वलितायम कहा गया. एक अन्य कथा के अनुसार, अप्सरा मेनका के शाप से पीड़ित गुरु बृहस्पति ने महर्षि मार्कंडेय के सुझाव पर यहां आकर मंदिर के पवित्र कुंड में स्नान किया और भगवान शिव की आराधना करके शाप से मुक्ति पाई. यही वजह है कि आज भी हर गुरुवार को यहां नवग्रह दोष और गुरु दोष से मुक्ति पाने के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है. यह देश के उन 3 गिने-चुने मंदिरों में शामिल है जहाँ स्वयं देवगुरु बृहस्पति ने पूजा-अर्चना की थी.

वास्तुकला की अनूठी छाप: गजपृष्ठ शैली का गर्भगृह

द्राविड़ शैली में बने इस मंदिर में प्रवेश करते ही 3 मंजिला भव्य राजगोपुरम नजर आता है. मंदिर का मुख्य गर्भगृह गजपृष्ठ आकृति में बना है, यानी इसका पिछला हिस्सा बैठे हुए हाथी की पीठ के समान दिखाई देता है. मंदिर के अंदर एक खास उभय दर्शन बिंदु है, जहां खड़े होकर श्रद्धालु एक साथ भगवान तिरुवल्लेश्वरर और माता जगदंबिका दोनों के दर्शन कर सकते हैं.

शिलालेखों में दर्ज चोल साम्राज्य का गौरव

इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर के वर्तमान मुख्य ढांचे का निर्माण 11वीं सदी में चोल राजाओं के शासनकाल में हुआ था. मंदिर की दीवारों पर दर्ज 14 से अधिक प्राचीन शिलालेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि उस दौर में इसे चिंतामणिपुरम और अंबत्तूर नाडू के नाम से जाना जाता था. शिलालेखों में विभिन्न राजाओं और भक्तों द्वारा मंदिर को दिए गए सोने, आभूषणों और भूमि दान का स्पष्ट उल्लेख मिलता है.

कैसे पहुंचे और पूजा का समय

यह मंदिर चेन्नई के पाडी क्षेत्र में स्थित है, जहां से निकटतम रेलवे स्टेशन कोरत्तूर मात्र 2.2 किलोमीटर की दूरी पर है. मंदिर में रोजाना सुबह 6:30 बजे से रात 8:00 बजे तक पांच अलग-अलग समय पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के बीच भव्य आरती और अभिषेक किया जाता है. तमिल महीने चित्तिरई में आयोजित होने वाला ब्रह्मोत्सवम और महाशिवरात्रि यहां के सबसे प्रमुख त्यौहार हैं.

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