गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर : क्यों कहलाता है दक्षिण भारत का ‘द्वारका’ ? अनोखी है कहानी!

इस मंदिर का इतिहास 5 हजार साल पुराना है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंदिर का संबंध द्वापर युग से है. यहां स्थापित भगवान की दिव्य मूर्ति मूल रूप से भगवान विष्णु द्वारा ब्रह्मा जी को दी गई थी.

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केरल: त्रिशूर जिले में स्थित गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर भारत के सबसे पवित्र और प्राचीन तीर्थस्थलों में से एक है. भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित इस मंदिर में प्रभु के बालरूप की पूजा होती है. यहां भगवान कृष्ण को गुरुवायुरप्पन के नाम से पूजा जाता है. माना जाता है कि इस पावन धाम में दर्शन करने से श्रद्धालुओं को मानसिक शांति, दिव्यता और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है. हर साल देश-विदेश से लाखों भक्त भगवान गुरुवायुरप्पन का आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं. जन्माष्टमी और गुरुवायूर एकादशी जैसे पावन अवसरों पर मंदिर का वातावरण अद्भुत और भक्तिमय हो जाता है.

पौराणिक इतिहास और मान्यताएं

गुरुवायूर मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है. इसका उल्लेख नारद पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे ग्रंथों में मिलता है. इस मंदिर का इतिहास 5 हजार साल पुराना है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंदिर का संबंध द्वापर युग से है. यहां स्थापित भगवान की दिव्य मूर्ति मूल रूप से भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को दी थी. बाद में, भगवान देवगुरु बृहस्पति और वायु देव ने मिलकर इस मूर्ति को केरल की इस पवित्र भूमि पर स्थापित किया. यही कारण है कि इस स्थान का नाम ‘गुरु-वायु-उर’ (गुरुवायूर) पड़ा. समय के साथ मंदिर पर कई संकट आए, लेकिन 17वीं शताब्दी में त्रावणकोर के महाराजा ने इसका जीर्णोद्धार कराया. मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप साल 1969 के पुनर्निर्माण के बाद अस्तित्व में आया.

अनूठी है मंदिर की वास्तुकला और विशेषताएं

गुरुवायूर मंदिर पारंपरिक केरल वास्तुशैली का उत्कृष्ट उदाहरण है. मंदिर का मुख्य शिखर लगभग 33.5 मीटर ऊंचा है, जो सोने की परतों से सुसज्जित है. गर्भगृह में स्थापित भगवान गुरुवायुरप्पन की 4 फीट ऊंची पावन मूर्ति दुर्लभ काले पत्थर से बनी है. मंदिर परिसर में एक पवित्र जलाशय है जिसे रुद्रतीर्थम कहा जाता है. भक्त यहां दर्शन से पूर्व स्नान करते हैं. मंदिर की एक अनूठी विशेषता इसका हाथी अनाथालय है, जहां मंदिर के समर्पित हाथियों की देखभाल की जाती है. मंदिर की पवित्रता और प्राचीन परंपराओं को बनाए रखने के लिए यहां केवल हिंदू धर्मावलंबियों को ही प्रवेश की अनुमति है.

मंदिर की प्रमुख रस्में और परंपराएं

बच्चों को जीवन में पहली बार अन्न खिलाने के लिए यह स्थान अत्यंत शुभ माना जाता है. इस अनोखी रस्म में भक्त अपने वजन के बराबर केला, चीनी, नारियल या नारियल तेल जैसी वस्तुएं भगवान को अर्पित करते हैं.

    दर्शन और ड्रेस कोड

    मंदिर के कपाट प्रातः 3:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक तथा सायंकाल 4:30 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक खुलते हैं. पुरुषों के लिए धोती और महिलाओं के लिए साड़ी या सलवार-कमीज अनिवार्य है. मंदिर परिसर में मोबाइल फोन, कैमरा और चमड़े की वस्तुएं ले जाना सख्त मना है.

    प्रमुख त्योहार और उत्सव

    • गुरुवायूर एकादशी: यह मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव है, जिसमें हजारों दीप जलाए जाते हैं और भव्य हाथी जुलूस निकाला जाता है.
    • विशु : नए साल के अवसर पर भगवान के शुभ दर्शन के लिए भारी भीड़ जुटती है.
    • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: बाल रूप श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.
    • ओणम: केरल के इस राज्योत्सव पर मंदिर में विशेष पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है.

    गुरुवायूर कैसे पहुंचें?

    गुरुवायूर, त्रिशूर से 29 किमी और कोच्चि से लगभग 80 किमी दूर है. राष्ट्रीय राजमार्ग 544 के माध्यम से बस या टैक्सी द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है. निकटतम रेलवे स्टेशन गुरुवायूर (GUV) है, जो मंदिर से मात्र 1 किमी की दूरी पर स्थित है. त्रिशूर रेलवे स्टेशन भी एक मुख्य विकल्प है. निकटतम हवाई अड्डा कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (COK) है, जो मंदिर से लगभग 87 किमी दूर है. हवाई अड्डे से टैक्सी द्वारा 2.5 घंटे में पहुंचा जा सकता है. गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है. यदि आप भक्ति, शांति और दक्षिण भारतीय संस्कृति का एक साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो भगवान गुरुवायुरप्पन के दर्शन की योजना अवश्य बनाएं.

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