मुज़िरिस: केरल का वो खोया साम्राज्य, जिसके ‘काले सोने’ के आगे कभी घुटने टेकता था रोमन साम्राज्य

विदेशी व्यापारी अपने विशाल जहाजों में भर-भरकर सोना लाते थे और बदले में यहां से काला सोना यानी काली मिर्च ले जाते थे. रोम के संभ्रांत वर्ग में मालाबार की काली मिर्च का ऐसा नशा था कि वे इसके लिए अपने शाही खजाने खाली करने को तैयार रहते थे.

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जब भी भारत के जलमग्न या खोए हुए ऐतिहासिक शहरों की बात होती है, तो अमूमन लोगों की जुबां पर सबसे पहला नाम गुजरात की द्वारका का आता है। परंतु, भारत के दक्षिणी छोर यानी केरल के मालाबार तट पर एक ऐसा व्यापारिक साम्राज्य भी रहा है, जिसने सहस्राब्दियों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा को तय किया था। हम बात कर रहे हैं प्राचीन बंदरगाह ‘मुज़िरिस’ (Muziris) की। प्रसिद्ध रोमन लेखक प्लिनी द एल्डर ने जिसे भारत का पहला एम्पोरियम कहा था, वह शहर आज से करीब 685 साल पहले एक ही रात में इतिहास के पन्नों से ओझल हो गया। आइए जानते हैं मुज़िरिस के उदय, उसकी बेहिसाब दौलत और उस प्रलयंकारी रहस्य की कहानी, जिसने इस स्वर्णिम शहर को मिट्टी में दफन कर दिया।

वैश्विक व्यापार का धुरंधर: जब रोम लुटाता था सोना

ईसा पूर्व पहली शताब्दी से अस्तित्व में रहा मुज़िरिस, चेर राजाओं के संरक्षण में अपनी समृद्धि के चरम पर था। यह महज़ एक गोदी या बंदरगाह नहीं, बल्कि उस दौर का ग्लोबल ट्रेड हब था, जहां रोम, मिस्र, अरब और चीन जैसे देशों के जहाज कतारों में खड़े रहते थे। यूनानी नाविक हिप्पालस द्वारा मानसून की हवाओं के सटीक मार्ग की खोज के बाद भूमध्य सागर से मुज़िरिस तक का सफर मात्र 40 दिनों का रह गया था। प्राचीन संगम साहित्य के पन्ने गवाही देते हैं कि विदेशी (यवन) व्यापारी अपने विशाल जहाजों में भर-भरकर सोना लाते थे और बदले में यहां से काला सोना यानी काली मिर्च ले जाते थे। रोम के संभ्रांत वर्ग में मालाबार की काली मिर्च का ऐसा नशा था कि वे इसके लिए अपने शाही खजाने खाली करने को तैयार रहते थे। मसालों के अलावा भारत से मोती, नीलम, हाथी दांत, रेशम और कीमती पत्थरों का निर्यात होता था, जबकि बदले में देश में रोमन स्वर्ण मुद्राएं, बेहतरीन कांच के बर्तन, वाइन, मिस्र के इत्र और अरबी घोड़ों का आयात किया जाता था।

‘मुज़िरिस पेपिरस’: अरबों के व्यापार का अकाट्य प्रमाण

मुज़िरिस की बेहिसाब दौलत का सबसे बड़ा लिखित प्रमाण 1980 में मिला। वियना के संग्रहालय में सुरक्षित मुज़िरिस पेपिरस नामक एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ इस वैभव पर मुहर लगाता है। यह समझौता मुज़िरिस के एक स्थानीय व्यापारी और मिस्र के एक फाइनेंसर के बीच हुआ था। इसमें हरमापोलोन नामक एक रोमन मालवाहक जहाज का ज़िक्र है, जिसमें लगभग 4 टन हाथी दांत और 790 पाउंड भारतीय मलमल लदा था। इस एक जहाज के कार्गो (माल) की कीमत उस वक्त 9 मिलियन सेस्टरसेस (रोमन मुद्रा) आंकी गई थी। अंदाज़ा लगाइए, उस दौर में एक रोमन सैनिक का सालभर का वेतन मात्र 800 सेस्टरसेस होता था। तत्कालीन वैश्विक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, रोमन साम्राज्य को अपनी कुल राजस्व कमाई का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी मुज़िरिस व्यापार से मिलने वाले टैक्स से प्राप्त होता था।


साल 1341: एक रात का प्रलय और भूगोल का बदलना

इतिहास गवाह है कि जो साम्राज्य युद्ध के मैदानों में नहीं हारे, उन्हें प्रकृति ने एक पल में घुटनों पर ला दिया। मुज़िरिस के साथ भी यही हुआ। साल 1341 में पेरियार नदी में एक ऐसी प्रलयंकारी बाढ़ आई, जिसने केरल के इस तटीय क्षेत्र का भूगोल हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इस जलप्रलय के साथ आई लाखों टन गाद और मिट्टी ने मुज़िरिस के प्राकृतिक बंदरगाह के मुहाने को पूरी तरह पाट दिया। भारी जहाजों का यहाँ पहुँचना नामुमकिन हो गया और देखते ही देखते व्यापार ठप हो गया। दिलचस्प बात यह है कि इसी बाढ़ के कारण समुद्र में 17 मील लंबा ‘वायपिन द्वीप’ उभर आया और आधुनिक ‘कोच्चि बंदरगाह’ की नींव पड़ी। जिस शहर की गलियों में कभी दुनिया भर की मुद्राओं की खनक गूंजती थी, वह अचानक रेत और मिट्टी की परतों के नीचे सो गया।

पट्टनम की खुदाई: रेत के नीचे से बोलता इतिहास

सदियों तक मुज़िरिस को केवल एक काल्पनिक लोककथा माना जाता रहा। लेकिन साल 2004 में केरल के ‘पट्टनम’ गांव में जब भारतीय पुरातत्वविदों ने कुदाल चलाई, तो इतिहास जीवंत हो उठा। खुदाई में 10,000 से अधिक रोमन बर्तनों के टुकड़े, ज़मीन के नीचे दबी 6 मीटर लंबी प्राचीन लकड़ी की नाव और जहाजों को बांधने वाले टीक (सागवान) की लकड़ी के विशाल खंभे मिले। वैज्ञानिकों ने जब यहां मिले प्राचीन नरकंकालों का डीएनए (DNA) टेस्ट किया, तो पुष्टि हुई कि यहां रोम और पश्चिम एशिया के लोग आकर बस गए थे। यह शहर न केवल व्यापार का, बल्कि संस्कृतियों और धर्मों के मिलन का भी अनूठा केंद्र था। मान्यता है कि ईसा मसीह के दूत सेंट थॉमस इसी तट पर उतरे थे और भारत की पहली ऐतिहासिक मस्जिद चेरामन जुमा मस्जिद (629 ईस्वी) भी इसी क्षेत्र में निर्मित हुई थी।

निष्कर्ष: धरोहर को सहेजने की चुनौती

द्वारका और मुज़िरिस में बुनियादी अंतर यही है कि द्वारका समुद्र की गहराइयों में खोई है, जबकि मुज़िरिस केरल की उपजाऊ मिट्टी के नीचे दबा है। वर्तमान में केरल सरकार मुज़िरिस हेरिटेज प्रोजेक्ट के ज़रिए इस खोई हुई दुनिया को एक लिविंग म्यूजियम के रूप में पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है। पुरातत्वविदों का मानना है कि अभी तक ऐतिहासिक स्थल की केवल 1 प्रतिशत ही खुदाई हो सकी है। ज़रा सोचिए, जब इस महान व्यापारिक केंद्र की पूरी मिट्टी हटेगी, तो भारत की प्राचीन आर्थिक महाशक्ति होने के और कितने स्वर्णिम अध्याय देश के सामने आएंगे। समय का चक्र भले ही साम्राज्यों को धूल में मिला दे, लेकिन उनकी गौरवशाली विरासत को कभी मिटा नहीं सकता।

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