मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच क्लस्टर बमों को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है।

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच क्लस्टर बमों को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। हालिया संघर्ष में इजरायल ने ईरान पर क्लस्टर बम इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून तथा मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है। हालांकि युद्ध में कई तरह के हथियार इस्तेमाल होते हैं, लेकिन क्लस्टर बम उन हथियारों में गिने जाते हैं जिनका असर युद्ध खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक बना रहता है। यही वजह है कि इन्हें दुनिया के सबसे विवादित हथियारों में शामिल किया जाता है।
क्या हैं क्लस्टर बम
क्लस्टर बम दरअसल एक ऐसा हथियार है जिसमें एक बड़े कंटेनर के अंदर कई छोटे-छोटे विस्फोटक भरे होते हैं। इस कंटेनर को मिसाइल, रॉकेट, आर्टिलरी शेल या लड़ाकू विमान के जरिए लक्ष्य की ओर छोड़ा जाता है। जब यह हवा में एक तय ऊंचाई पर पहुंचता है तो इसका बाहरी खोल खुल जाता है और इसके अंदर मौजूद दर्जनों या सैकड़ों छोटे बम चारों ओर फैल जाते हैं।इन छोटे बमों को सबम्युनिशन या बॉम्बलेट कहा जाता है। ये जमीन पर गिरते ही विस्फोट करते हैं और बड़े इलाके में तबाही मचाते हैं। सामान्य बम जहां एक ही जगह पर फटता है, वहीं क्लस्टर बम एक साथ कई स्थानों को प्रभावित करता है। इसी वजह से इसे “एरिया वेपन” भी कहा जाता है।
कैसे काम करता है यह हथियार
क्लस्टर बम का काम करने का तरीका पारंपरिक बमों से अलग होता है। जब इसे लक्ष्य की ओर भेजा जाता है तो इसका मुख्य कंटेनर हवा में ही खुल जाता है। इसके बाद अंदर मौजूद सबम्युनिशन अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं और जमीन पर गिरते हैं।एक क्लस्टर कंटेनर में 9 से लेकर कई सौ तक छोटे विस्फोटक हो सकते हैं। ये अलग-अलग जगह गिरकर विस्फोट करते हैं और बड़ी जगह को प्रभावित करते हैं। सैन्य रणनीति में इसका इस्तेमाल दुश्मन के सैनिकों, सैन्य वाहनों, हवाई पट्टियों या बड़े सैन्य ठिकानों को एक साथ निशाना बनाने के लिए किया जाता है।लेकिन वास्तविक स्थिति में इसका असर अक्सर रिहायशी इलाकों तक पहुंच जाता है, क्योंकि यह सैनिक और आम नागरिक के बीच फर्क नहीं कर पाता।
क्यों इतने खतरनाक माने जाते हैं
क्लस्टर बमों को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि इनका असर बहुत बड़े इलाके में फैलता है। कई बार एक क्लस्टर बम फुटबॉल मैदान जितने क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। छोटे आकार के बावजूद ये बम 50 से 100 मीटर के दायरे में भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं।सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें से कई बम तुरंत नहीं फटते। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 2 से 40 प्रतिशत सबम्युनिशन जमीन पर गिरकर निष्क्रिय अवस्था में पड़े रह जाते हैं। बाद में ये लैंडमाइन की तरह काम करते हैं और जैसे ही कोई व्यक्ति या वाहन इनके संपर्क में आता है, विस्फोट हो सकता है।यही कारण है कि कई बार युद्ध खत्म होने के वर्षों बाद भी इन बमों से दुर्घटनाएं होती रहती हैं। कई देशों में बच्चे या आम नागरिक इन अनफटे बमों का शिकार बन चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय नियम और प्रतिबंध
क्लस्टर बमों से होने वाले खतरे को देखते हुए 2008 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता किया गया जिसे “कन्वेंशन ऑन क्लस्टर म्युनिशन्स” कहा जाता है। इस समझौते के तहत क्लस्टर बमों के उत्पादन, भंडारण, व्यापार और इस्तेमाल पर रोक लगाने का प्रयास किया गया।इस समझौते पर 100 से ज्यादा देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। समझौते में शामिल देश क्लस्टर बम न तो बनाएंगे, न खरीदेंगे और न ही युद्ध में इनका इस्तेमाल करेंगे। साथ ही उन्हें अपने क्षेत्रों में पड़े पुराने क्लस्टर बमों को साफ करने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।हालांकि दुनिया की कई बड़ी सैन्य शक्तियां इस समझौते में शामिल नहीं हैं। अमेरिका, रूस, चीन, भारत, इजरायल और ईरान जैसे देश अभी तक इस संधि का हिस्सा नहीं बने हैं। इन देशों का मानना है कि कुछ परिस्थितियों में यह हथियार सैन्य रूप से उपयोगी हो सकता है।
किन देशों के पास हैं ये हथियार
अनुमान के अनुसार दुनिया के लगभग 30 से अधिक देशों के पास क्लस्टर बम मौजूद हैं। इनमें से कई देशों ने अलग-अलग युद्धों में इनका इस्तेमाल भी किया है। इतिहास में वियतनाम युद्ध, खाड़ी युद्ध और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों में क्लस्टर बमों के इस्तेमाल के उदाहरण मिलते हैं।हाल के वर्षों में यूक्रेन युद्ध के दौरान भी इनके इस्तेमाल को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई थीं, जिसके बाद एक बार फिर इन हथियारों को लेकर वैश्विक बहस तेज हो गई थी।
बनाने में कितना खर्च आता है
क्लस्टर बमों की कीमत उनकी तकनीक और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करती है। साधारण आर्टिलरी शेल में लगाए जाने वाले क्लस्टर म्युनिशन अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं। उदाहरण के तौर पर 155 मिमी आर्टिलरी शेल में इस्तेमाल होने वाले क्लस्टर बम की कीमत लगभग 500 से 3000 डॉलर तक हो सकती है।भारतीय मुद्रा में यह करीब 40 हजार रुपये से लेकर लगभग ढाई लाख रुपये तक बैठती है। वहीं अगर इन्हें आधुनिक गाइडेड सिस्टम, स्मार्ट टारगेटिंग टेक्नोलॉजी या बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ जोड़ा जाए तो इनकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे उन्नत हथियारों की लागत लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है।
क्यों जारी है विवाद
क्लस्टर बमों को लेकर विवाद इसलिए बना हुआ है क्योंकि एक तरफ इन्हें सैन्य दृष्टि से प्रभावी हथियार माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ यह आम नागरिकों के लिए लंबे समय तक खतरा पैदा करते हैं। यही वजह है कि कई देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन इन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग करते रहे हैं।फिलहाल दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई नजर आती है—कुछ देश इन हथियारों पर पूरी तरह प्रतिबंध चाहते हैं, जबकि कुछ देश इन्हें अपनी सैन्य रणनीति का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं।क्लस्टर बम आधुनिक युद्ध के उन हथियारों में शामिल हैं जिनका असर केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहता। इनके कारण युद्ध खत्म होने के बाद भी आम लोगों की जान खतरे में बनी रहती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन्हें लेकर लगातार बहस जारी है और कई देश इनके पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं।



