त्रियुगीनारायण मंदिर: जहां हुई थी शिव-पार्वती की शादी… 3 युगों से जल रही है ‘अखंड अग्नि’

जहां तीन युगों से आज भी जल रही है शिव-पार्वती के विवाह की अग्नि. जानिए क्यों आज की पीढ़ी करोड़ों की शादियां छोड़ इस पावन धाम की ओर खिंची चली आ रही है.

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Triyuginarayan Temple History

उत्तराखंड: हिमालय की शांत वादियों में बसा एक छोटा सा गांव त्रियुगीनारायण आज पूरी दुनिया के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. यह वह स्थान है जहां समय जैसे ठहर सा गया है. यहां एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसकी अखंड अग्नि त्रेता, द्वापर और कलियुग बीत जाने के बाद भी ठंडी नहीं हुई. मान्यता है कि इसी स्थान पर ब्रह्मांड के सबसे बड़े विवाह की शहनाई गूंजी थी.

शिव-पार्वती के मिलन की पावन भूमि

केदारनाथ मार्ग पर स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि सनातन धर्म की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जहां महादेव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था. पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव ने उनसे विवाह करना स्वीकार किया, तब इस दिव्य आयोजन के लिए इसी धरती को चुना गया.

विवाह के साक्षी बने थे ब्रह्मा और विष्णु

इस विवाह की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी इस विवाह के पंडित बने थे. वहीं, भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई का धर्म निभाते हुए कन्यादान की सभी रस्में पूरी की थीं. मंदिर परिसर में आज भी वो अक्षय वट का वृक्ष मौजूद है, जिसके नीचे बैठकर देवताओं और ऋषियों ने इस अलौकिक विवाह को अपनी आंखों से देखा था.

तीन युगों से प्रज्वलित ‘अखंड धूनी’ का रहस्य

मंदिर के गर्भगृह में जल रही अग्नि को अखंड धूनी कहा जाता है. माना जाता है कि शिव-पार्वती ने इसी अग्नि के चारों ओर सात फेरे लिए थे. यह अग्नि तीन युगों (त्रेता, द्वापर और कलियुग) से निरंतर प्रज्वलित है, इसीलिए इस स्थान का नाम ‘त्रियुगीनारायण’ पड़ा. श्रद्धालु आज भी इस धूनी की राख को अपने साथ ले जाते हैं, ताकि उनके वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहे.

चार पवित्र कुंडों की महिमा

विवाह से पहले की रस्मों के लिए यहां चार कुंडों का विशेष महत्व बताया गया है:

  1. ब्रह्म कुंड: जहां विवाह से पूर्व ब्रह्मा जी ने स्नान किया था.
  2. विष्णु कुंड: जहां भगवान विष्णु ने मार्जन किया था.
  3. रुद्र कुंड: जहां अन्य देवताओं ने स्नान किया.
  4. सरस्वती कुंड: जिसका जल आज भी पूजा और पवित्र अनुष्ठानों के लिए प्रयोग किया जाता है.

आधुनिकता के दौर में ‘आध्यात्मिक विवाह’ का क्रेज

आज के दौर में जहां लोग करोड़ों रुपये खर्च कर बड़े-बड़े रिसॉर्ट्स में डेस्टिनेशन वेडिंग करते हैं, वहीं नई पीढ़ी अब त्रियुगीनारायण की ओर रुख कर रही है. टीवी एक्ट्रेस कविता कौशिक जैसे कई सेलिब्रिटीज ने चकाचौंध को छोड़कर महादेव की इस पावन धूनी के सामने सात फेरे लेना बेहतर समझा. लोग अब समझ रहे हैं कि शादी सिर्फ एक सोशल इवेंट नहीं, बल्कि एक जन्म-जन्मांतर का आध्यात्मिक बंधन है.

विवाह के लिए जरूरी नियम और जानकारी

त्रियुगीनारायण मंदिर बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के अंतर्गत आता है। यदि आप यहां विवाह करना चाहते हैं, तो कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

पंजीकरण: विवाह के लिए पहले से रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक है।

मर्यादा: मंदिर एक पवित्र तीर्थ है, इसलिए यहां शोर-शराबे और फूहड़पन की कोई जगह नहीं है.

कैसे पहुंचें

यह स्थान सोनप्रयाग से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है. ऋषिकेश या देहरादून से सड़क मार्ग द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है. त्रियुगीनारायण केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि प्रेम, तपस्या और अटूट विश्वास का प्रतीक है. यदि आप भी अपने जीवन की नई शुरुआत महादेव और नारायण के आशीर्वाद के साथ करना चाहते हैं, तो यह धाम आपके लिए सबसे उत्तम है। लेकिन याद रहे, इन तीर्थों की पवित्रता बनाए रखना हम सबकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.

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