उत्तराखंड: समुद्र तल से 5,029 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हिमालय की गोद में एक ऐसी जगह है, जहां प्रकृति की सुंदरता के साथ मौत का एक खौफनाक रहस्य भी दफन है. उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित रूपकुंड झील को पूरी दुनिया कंकाल झील (Skeleton Lake) के नाम से जानती है.
1942 की एक खोज
इस रहस्यमयी स्थान की जानकारी दुनिया को साल 1942 में मिली. नंदा देवी नेशनल पार्क के रेंजर, हरि किशन मधवाल, जब इस झील के पास पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए. झील के चारों ओर इंसानी हड्डियों और खोपड़ियों का अंबार लगा था. शुरुआत में ब्रिटिश सरकार को लगा कि ये द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सैनिकों के शव हो सकते हैं, लेकिन बाद की जांच में पता चला कि ये हड्डियां सदियों पुरानी थीं.
विज्ञान का चौंकाने वाला खुलासा
दशकों तक माना जाता रहा कि ये सभी लोग एक ही आपदा का शिकार हुए थे, लेकिन साल 2019 में नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस धारणा को बदल दिया. 38 कंकालों के DNA विश्लेषण से पता चला कि इन लोगों की मृत्यु के बीच लगभग 1,000 वर्षों का अंतर था. ग्रुप A ये लगभग 800 ईस्वी के आसपास के भारतीय मूल के लोग थे. ग्रुप B ये 1800 ईस्वी के आसपास के भूमध्यसागरीय मूल (यूनान और क्रीट द्वीप) के निवासी थे. ग्रुप C इस समूह में दक्षिण-पूर्व एशिया का एक व्यक्ति भी शामिल था. वैज्ञानिक आज भी इस बात का जवाब खोज रहे हैं कि 19वीं सदी में यूनान से आए लोग हिमालय की इस निर्जन ऊंचाई पर क्या कर रहे थे?
विज्ञान बनाम लोककथाएं
वैज्ञानिकों को खोपड़ियों पर गोल वस्तुओं के प्रहार के गहरे निशान मिले हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि इन लोगों की मौत संभवतः क्रिकेट की गेंद के आकार के ओलों की मार से हुई थी. वहीं, स्थानीय लोककथाएं कुछ और ही बयां करती हैं. कहा जाता है कि कन्नौज के राजा जसधवल अपनी रानी बलम्पा और नाचने-गाने वालों के एक दल के साथ नंदा देवी की तीर्थयात्रा पर निकले थे. राजा के विलासितापूर्ण व्यवहार से क्रोधित होकर देवी नंदा ने आसमान से लोहे के गोलों की बारिश कर दी, जिससे पूरा दल वहीं नष्ट हो गया.
विरासत को खतरा और वर्तमान स्थिति
रूपकुंड का यह स्थान एक लिविंग लेबोरेटरी है, लेकिन आज यह खतरे में है. हर साल यहां आने वाले हजारों ट्रेकर्स अनजाने में इतिहास के इन बहुमूल्य साक्ष्यों को नष्ट कर रहे हैं. कई लोग हड्डियों को यादगार के तौर पर अपने साथ ले जाते हैं, जिससे पुरातात्विक कड़ियां टूट रही हैं. इसी को देखते हुए 2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बुग्यालों में कैंपिंग पर रोक लगा दी थी. आज रूपकुंड केवल एक पर्यटक स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रकोप और मानव इतिहास के उस पन्ने का प्रतीक है जो शायद कभी पूरी तरह नहीं लिखा जा सका.




