2024 के लोकसभा चुनाव में संघ की चेतावनी को नजरअंदाज करना बीजेपी को भारी पड़ गया था। यूपी, जहां से देश की सत्ता का रास्ता निकलता है, वहां 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को अप्रत्याशित रूप से सीटें गंवानी पड़ी थीं। इसका डैमेज कंट्रोल करने के लिए बीजेपी ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए जमीन मजबूत करनी शुरू कर दी है।
लखनऊ: उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के तीन दिवसीय दौरे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत पहुंचे हैं। तीन दिनों में मोहन भागवत की कई बैठकें होनी हैं। बताया जा रहा है कि उनका यह दौरा संघ के शताब्दी वर्ष के तहत हो रहे विभिन्न कार्यक्रमों की समीक्षा के लिए है। इसके साथ ही मोहन भागवत सीएम योगी समेत बीजेपी के प्रमुख पदाधिकारियों से भी मुलाकात करेंगे।2027 के विधानसभा चुनाव के लिए संघ पर भी बड़ी जिम्मेदारी है। संघ को बीजेपी की धुरी माना जाता है। ऐसे में मोहन भागवत यूपी में तीन दिन रहकर सत्ता, संगठन और संघ के बीच समन्वय बनाने का काम करेंगे। इस दौरान राजनीतिक तौर पर यूपी में होने वाले जातीय समीकरणों को साधने की चुनौतियों से निपटने पर भी मंथन तय माना जा रहा है।
संघ की अहम बैठकें ले रहे मोहन भागवत
जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है, जिसके चलते देशभर में कार्यक्रम हो रहे हैं। यूपी में भी अवध, गोरक्ष, काशी और कानपुर प्रांत के स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है। मोहन भागवत संघ के पूर्वी क्षेत्र के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलनों सहित विभिन्न अभियानों के अलावा शाखा विस्तार पर भी चर्चा करेंगे।
यूपी ‘मिशन 2027’ के लिए मैदान में सत्ता-संघ
जिस तरह बिहार का चुनाव साधने के लिए जातीय गोलबंदी राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती रही है, वैसे ही यूपी में भी जातीय समीकरणों को साधना बड़ी चुनौती बन जाता है। सूत्र बताते हैं कि संघ का मानना है राजभर की सुभासपा, निषाद पार्टी और अनुप्रिया पटेल के अपना दल का साथ होने से यूपी में पिछड़े समाज की बड़ी आबादी बीजेपी के साथ है।इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले के कारण वोटों के बिखराव ने बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी। यही कारण है कि इस बार बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। इसलिए मोहन भागवत का तीन दिवसीय दौरा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अखिलेश के PDA फॉर्मूले की काट ढूंढना जरूरी
बीजेपी के फायरब्रांड हिंदुत्व चेहरे सीएम योगी का नारा “बटेंगे तो कटेंगे” हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में तो काम आया, लेकिन यूपी में लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को मुद्दा बनाकर बीजेपी को पछाड़ दिया था।जिसके कारण इस बार फिर सपा इसे और मजबूती के साथ भुनाने की तैयारी में है। दूसरी ओर बसपा अध्यक्ष मायावती भी कोशिशों में जुटी हैं। रविवार को ही पदाधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने ब्राह्मण समाज को बसपा के साथ आने का संदेश दिया है।यह माना जा रहा है कि उनकी कोशिश 2007 की तरह ही दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण समाज को एकजुट करके बीजेपी और समाजवादी पार्टी के सामने फिर से चुनौती खड़ी करने की है।
2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने की थी संघ की अनदेखी
2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम ने एनडीए को हिलाकर रख दिया था। “400 पार” का नारा देने वाली बीजेपी 240 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। सीटों के घटने के बड़े कारणों में अति-आत्मविश्वास और संघ की अनदेखी को मुख्य माना गया।चुनाव के समय बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बीजेपी अब सक्षम है और उसे संघ के साथ की जरूरत नहीं। लेकिन नतीजों ने बता दिया कि अकेले चुनावी नैया पार लगाना बीजेपी के बस की बात नहीं है।परिणाम आने के बाद संघ से जुड़ी कई पत्रिकाओं में यह बात सामने आई कि चुनावी अभियान के दौरान बीजेपी नेताओं ने आरएसएस स्वयंसेवकों से संपर्क नहीं किया। अति-आत्मविश्वास में जमीनी स्तर पर पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की गई।चुनाव परिणामों में सीटों में गिरावट के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने बिना नाम लिए बीजेपी के अहंकार और चुनाव प्रचार के दौरान मर्यादा न रखने पर सवाल उठाए थे।
महाराष्ट्र में महायुति की सरकार बनाने में RSS का रोल
लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद बीजेपी ने सबक लिया। इसके बाद महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव की कमान संघ ने संभाली। अंदरखाने चर्चाओं का बाजार गर्म रहा कि बीजेपी संघ को नजरअंदाज करने की गलती नहीं दोहराएगी।दरअसल, महाराष्ट्र में आरएसएस का बहुत बड़ा नेटवर्क है, जो चुपचाप काम करता है। महायुति की जीत के पीछे आरएसएस की रणनीति और चुनाव प्रबंधन का बड़ा हाथ था। RSS के कार्यकर्ताओं ने पूरे महाराष्ट्र में डेरा डालकर यह सुनिश्चित किया कि उम्मीदवारों को हर विधानसभा क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा वोट मिलें।




