गोवा सिर्फ अपने खूबसूरत समुद्र तटों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन और रहस्यमयी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है. गोवा के पोंडा तालुका के कुंडई गांव में एक ऐसी अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखकर पहली बार में किसी की भी रूह कांप जाए. इसे कहते हैं ‘कड्डा पूजा’ (Kadda Puja). यहां न कोई मूर्ति है, न कोई भव्य मंदिर का गर्भगृह, बल्कि यहां ‘अग्नि’ और ‘सूखी घास’ के जरिए एक क्रोधित योगी को शांत किया जाता है.
क्या है ‘कड्डा पूजा’ का अर्थ?
कोंकणी भाषा में ‘कड्डा’ का अर्थ होता है सूखी घास या भूसा. इस पूजा में मंदिर के चारों ओर सूखी घास बिछाई जाती है और फिर उसमें आग लगा दी जाती है. यह पूरी परंपरा श्री सिद्धेश्वर योगी के सम्मान में निभाई जाती है. जब आग की लपटें आसमान छूती हैं, तो ऐसा लगता है मानो पूरा गांव अग्नि स्नान कर रहा हो.
500 साल पुराना इतिहास और योगी का क्रोध
मान्यता है कि सदियों पहले पवित्र योगी श्री सिद्धेश्वर इस क्षेत्र से गुजर रहे थे. वे गांव के प्रतिष्ठित ‘शेनवी कुंडईकर’ परिवार के घर रुके थे. योगी वहां पूजा करना चाहते थे, लेकिन पूजा के दौरान परिवार से अनजाने में कुछ भूल हो गई. इससे योगी इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने अनुष्ठान को बीच में ही छोड़ दिया और वहां से चले गए. वे गांव के उसी स्थान पर अंतर्धान हो गए जहां आज उनका पवित्र स्थान बना है. उनकी नाराजगी दूर करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए ही इस ‘अग्नि भेंट’ की परंपरा शुरू हुई.
आज भी निभाई जाती है रस्म
हैरानी की बात यह है कि 500 साल बाद भी इस पूजा की शुरुआत उसी शेनवी कुंडईकर परिवार का वंशज नारियल चढ़ाकर करता है. हर साल जनवरी में मकर संक्रांति के दौरान हजारों श्रद्धालु यहाँ जुटते हैं. लोग अपने साथ सूखी घास का गट्ठर और नारियल लाते हैं. दहकती ज्वाला में नारियल अर्पित करना अपनी समस्याओं को भस्म करने का प्रतीक माना जाता है.




