रंगो के त्योहार होली को लेकर लोग बेहद उत्साहित रहते हैं, हुड़दंग और रंगों की बौछार वाला ये त्योहार लोगों की जिंदगी में खुशियों का रंग भर देता है. आमतौर पर होलिका दहन के अगले ही दिन हम अबीर-गुलाल के साथ गलियों में निकल पड़ते हैं, लेकिन साल 2026 की होली कुछ अलग होने जा रही है. खगोलीय गणना और शास्त्र सम्मत नियमों के कारण इस बार देश के त्योहार का गणित पूरी तरह बदल गया है.अगर आप 3 मार्च को रंग खेलने की योजना बना रहे हैं, तो रुकिए! ज्योतिषीय और आध्यात्मिक कारणों से इस बार रंगों वाली होली 4 मार्च को मनाई जाएगी. आइए जानते आखिर क्यों बदला है इस बात त्योहार का गणित.
खगोलीय घटना: 3 मार्च को ‘ब्लड मून’ का साया
इस साल होली के उल्लास के बीच ब्रह्मांड में एक दुर्लभ और बड़ी घटना घटने जा रही है. होली से पहले पूर्ण चंद्र ग्रहण लगने वाला है. 3 मार्च को लगने वाले इस ग्रहण को वैज्ञानिक भाषा में ‘ब्लड मून’ कहा जा रहा है. शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के दौरान सूतक काल प्रभावी होता है. 3 मार्च की सुबह 06:23 बजे से ग्रहण का प्रभाव शुरू होकर शाम 06:47 बजे तक रहेगा. सूतक काल और ग्रहण के दौरान किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य, उत्सव या पूजा-पाठ को वर्जित माना गया है. यही कारण है कि 3 मार्च को रंगों का त्योहार मनाना शास्त्र सम्मत नहीं है.
संत प्रेमानंद जी महाराज की विशेष चेतावनी
वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत श्री प्रेमानंद जी महाराज ने भी इस संदर्भ में भक्तों को विशेष रूप से सचेत किया है. महाराज जी के अनुसार ग्रहण काल में ब्रह्मांड में नकारात्मक ऊर्जा का स्तर बढ़ जाता है. चूंकि चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए इस समय शोर-शराबा या हुड़दंग मानसिक अशांति पैदा कर सकता है. महाराज जी ने भक्तों से अपील की है कि 3 मार्च को रंगों के शोर में डूबने के बजाय एकांत में नाम जप और प्रभु भक्ति में समय बिताएं. उनके अनुसार, ग्रहण के साये में उत्सव मनाना शुभ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक हानि पहुंचा सकता है.
क्यों 4 मार्च ही है सबसे मंगलकारी?
ज्योतिषाचार्यों और संतों का मत है कि शुद्धि के बाद ही उत्सव श्रेष्ठ होता है. 3 मार्च की शाम 06:47 बजे जब ग्रहण समाप्त होगा, उसके बाद मंदिरों की सफाई, मूर्तियों का अभिषेक और स्वयं का शुद्धि स्नान किया जाएगा. शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के दोष से मुक्त होने के बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा का शुद्ध सूर्योदय 4 मार्च को होगा. इसी दिन रंगों से खेलना न केवल सौभाग्य लाएगा, बल्कि जातक को ग्रहण के किसी भी दुष्प्रभाव से बचाएगा.
संयम से सौभाग्य की ओर
इस वर्ष की होली हमें संयम और भक्ति का पाठ पढ़ा रही है. परंपराओं का सम्मान करते हुए, 2 मार्च की रात को होलिका दहन के साथ अपनी बुराइयों का अंत करें, 3 मार्च को शांति और ध्यान के साथ ग्रहण काल व्यतीत करें, और अंततः 4 मार्च की अलसुबह पूरे जोश और मंगलकामनाओं के साथ रंगों के उत्सव का आनंद लें. याद रखें, शास्त्रों और संतों के बताए मार्ग पर चलकर मनाया गया त्योहार ही जीवन में सुख-समृद्धि लेकर आता है.




