गोवा: जब पूरी दुनिया रंगों के त्योहार होली के जश्न में डूबी होती है, तब गोवा के एक शांत कोने में सन्नाटा पसर जाता है. यहां ‘मौत’ का एक ऐसा खौफनाक मंजर सजाया जाता है जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं. यह गोवा के उस चेहरे की कहानी है, जिसे सैलानियों की भीड़ और समुद्र की लहरें अक्सर छिपा लेती हैं.
प्रायश्चित का वह ‘खूनी’ इतिहास
गोवा के सत्तरी तालुका में स्थित ज़र्मे और करंजोल गांवों में सदियों से ‘चोर-उत्सव’ मनाया जा रहा है. लोक मान्यताओं के अनुसार, इसकी जड़ें काशी के एक महान ऋषि से जुड़ी हैं, जिन्होंने धर्म की स्थापना के लिए इस गांव की नींव रखी थी. चोरला घाट के मार्ग पर स्थित यह गांव व्यापारियों के लिए जीवन रेखा था, लेकिन घने जंगलों के कारण लुटेरों का गढ़ भी था. इतिहास कहता है कि सदियों पहले यहां एक भयानक भूल हुई. कुछ मासूम व्यापारियों को गांव वालों ने गलती से चोर समझ लिया और उन्हें बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. जब उनके वृद्ध माता-पिता अपने बच्चों को खोजते हुए गांव पहुंचे, तब ग्रामीणों को अपनी सामूहिक गलती का अहसास हुआ. उन बेगुनाह रूहों के श्राप से बचने के लिए तब से लेकर आज तक, यह गांव हर साल अपने पूर्वजों के उस पाप का लिखित माफीनामा पेश करता है.
अनुष्ठान: ज़िंदा दफन होने की खौफनाक परंपरा
यह कोई सामान्य उत्सव नहीं, बल्कि एक कठोर धार्मिक अनुष्ठान है. इस अनुष्ठान को निभाने के लिए गांव के आठ विवाहित पुरुषों को चुना जाता है. चार पुरुषों को इस तरह दफन किया जाता है कि केवल उनके सिर ज़मीन से बाहर रहें. बाकी चार को इस तरह लिटाया जाता है कि उनका धड़ बाहर और सिर ज़मीन के अंदर हो. उनके हाथों में नंगी तलवारें होती हैं. पास ही दो किशोरों को लकड़ी के ऊंचे खंभों पर बैठाकर फूलों से सजाया जाता है, जो उन मृत बच्चों की याद दिलाते हैं. दफन करने की यह तकनीक एक गुप्त विद्या है, जिसे ग्रामीण बाहरी दुनिया से पूरी तरह छिपा कर रखते हैं.
करंजोल का स्वस्तिक और आत्माओं का प्रवेश
ज़र्मे के एक हफ्ते बाद करंजोल गांव में यह मंजर और भी गंभीर हो जाता है. यहां नौ लोग स्वस्तिक के आकार के गड्ढों में दफन होते हैं. जैसे ही हवा में बंदूक की गोली दागी जाती है, माना जाता है कि मारे गए निर्दोषों की आत्माएं उन पुरुषों के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं. वे एक अजीब स्थिति में मंदिर की ओर दौड़ते हैं.
‘रणमाले’ और सामूहिक अपराध बोध
अनुष्ठान के बाद रणमाले नामक लोक नाट्य होता है. जिसमें अंधेरी रात में मशालें लेकर दो पुरुष माता-पिता का किरदार निभाते हैं और अपने खोए हुए बेटों को ढूंढते हैं. उनकी करुण धुन और विलाप आज भी उस ऐतिहासिक अपराध की याद दिलाकर पूरे वातावरण को भारी कर देता है.
सती परंपरा और ‘बारहवां’ भोज
अगली सुबह, प्रतीकात्मक रूप से मारे गए पुरुषों की पत्नियों के सती होने के दृश्य को पुरुष ही निभाते हैं. अंत में, पूरा गांव एक साथ भोजन करता है. हिंदू धर्म में बारहवां केवल मृत्यु के बाद होता है, लेकिन यहां हर साल यह भोज करना इस बात का प्रमाण है कि गांव आज भी उन मौतों का शोक मना रहा है. गोवा का ‘चोर-उत्सव’ पर्यटन का आकर्षण नहीं, बल्कि एक सामूहिक कन्फेशन है. यह हमें याद दिलाता है कि जल्दबाजी में किया गया ‘न्याय’ वास्तव में सबसे बड़ा ‘अन्याय’ होता है. ज़र्मे और करंजोल के लोग मानते हैं कि अगर उन्होंने यह परंपरा बंद की, तो उन निर्दोषों का श्राप पूरे गांव को भस्म कर देगा.




