सोना और चांदी इन दिनों जैसे रुक से गए हैं। जबकि दुनिया भर की ज़्यादातर परिस्थितियां इनके पक्ष में दिखाई दे रही हैं, फिर भी दोनों में वैसी तेज़ी नहीं दिख रही जैसी लोगों को उम्मीद थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या तेजी का दौर खत्म हो रहा है, क्या बाजार सिर्फ थोड़ा ठंडा पड़ा है, या फिर कोई बड़ा संकेत मिलने का इंतजार कर रहा है।
अगर पूरी दुनिया की हालत देखें तो लगभग हर चीज़ सोने और चांदी के पक्ष में दिखाई देती है। सबसे बड़ा कारण अमेरिका का केंद्रीय बैंक है। बाजार अभी तक यह समझ नहीं पा रहा कि ब्याज दरें घटेंगी या नहीं, अगर घटेंगी तो कब और कितनी घटेंगी। जब तक इस बात पर साफ तस्वीर नहीं आती, तब तक सोना और चांदी किसी बड़े उछाल में नहीं जाएंगे।
अमेरिका में महंगाई अभी भी बड़ी समस्या बनी हुई है। सरकारी आंकड़े भले महंगाई कम दिखा रहे हों, लेकिन आम लोगों को रोजमर्रा के खर्च में काफी ज्यादा महंगाई महसूस हो रही है। लोगों की तनख्वाह उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही, कमाई की असली ताकत घट रही है और खर्च करने की क्षमता कम हो रही है। जब लोगों की जेब कमजोर होती है तो खर्च कम होता है, कारोबार धीमा पड़ता है और मंदी का डर बढ़ जाता है। ऐसी हालत में लोग सुरक्षित निवेश की तरफ जाते हैं और सोना हमेशा से सुरक्षित माना जाता है।इसके अलावा अमेरिका में बिजली भी काफी महंगी हो गई है। इससे कंपनियों का खर्च बढ़ रहा है, मुनाफा कम हो रहा है और लोगों की जेब पर भी असर पड़ रहा है।ऋण बाजार में भी इस समय काफी उथल-पुथल चल रही है। बड़े निवेशक सामान्य बाजारों को लेकर डरे हुए दिखाई दे रहे हैं और सुरक्षित जगह ढूंढ रहे हैं।
दूसरी तरफ ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दोनों तरफ से बयानबाजी जारी है। हालांकि अच्छी बात यह है कि बातचीत के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं। यानी दुनिया में अनिश्चितता अभी बनी हुई है और अनिश्चितता का फायदा अक्सर सोने को मिलता है।
इतने सारे कारण साथ होने के बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिर सोना और चांदी तेज़ी से ऊपर क्यों नहीं जा रहे। हाल ही में सोना लगभग 4868 डॉलर तक गया था और वहां से गिरकर करीब 4500 डॉलर तक आ गया। यानी लगभग 7 प्रतिशत की गिरावट आई।
असल में सोने के रुकने की सबसे बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि बाजार पहले ही काफी ज्यादा उम्मीदें लगा चुका था। लोगों ने पहले से ही भविष्य की तेजी को कीमतों में जोड़ लिया था। इसलिए थोड़ी गिरावट आना स्वाभाविक था। अभी सोना नीचे गिरने के बाद संभल तो रहा है, लेकिन नई ऊंचाई नहीं बना पा रहा। इसका मतलब है कि बाजार अभी आराम के दौर में है।
तकनीकी रूप से देखें तो 4560 डॉलर बड़ा रुकावट वाला स्तर माना जा रहा है। अगर सोना इसके ऊपर निकलता है तो 4630 डॉलर की तरफ जा सकता है। वहीं 4300 डॉलर बड़ा सहारा माना जा रहा है। अगर यह टूटता है तो सोना 4100 डॉलर तक भी गिर सकता है।डॉलर भी इस समय सोने की रफ्तार को रोक रहा है। डॉलर मजबूत बना हुआ है और जब डॉलर मजबूत होता है तो आमतौर पर सोने पर दबाव आता है। यही वजह है कि सोना अभी खुलकर ऊपर नहीं भाग पा रहा।
बड़े बैंक भी अब थोड़ा संभलकर बोल रहे हैं। यूबीएस बैंक ने पहले 2026 के अंत तक सोने का लक्ष्य 5900 डॉलर बताया था, लेकिन अब उसने इसे घटाकर करीब 5500 डॉलर कर दिया है। इससे साफ है कि बड़े संस्थान भी अभी सावधानी बरत रहे हैं।
हालांकि चांदी की हालत सोने से थोड़ी अलग दिखाई दे रही है। चांदी अभी ज्यादा मजबूत लग रही है। यह लगातार ऊपर के नए स्तर बनाने की कोशिश कर रही है और गिरने के बाद भी अच्छे स्तर पर टिक रही है। अभी चांदी 70 से 80 डॉलर के दायरे से निकलकर 80 से 90 डॉलर की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन 78 डॉलर के आसपास काफी बिकवाली आ जाती है।
आने वाले समय में चांदी में काफी तेज़ उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। 10 से 15 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे होना अब सामान्य बात बन सकता है। लेकिन लंबी अवधि में चांदी के लिए सबसे बड़ा सहारा उसकी बढ़ती मांग और कम होती आपूर्ति बन सकती है।
पहले माना जा रहा था कि चांदी की कमी लगभग 1400 मीट्रिक टन रहेगी, लेकिन अब नई रिपोर्ट्स कह रही हैं कि यह कमी और बढ़ सकती है। दुनिया में चांदी की मांग लगातार बढ़ रही है जबकि आपूर्ति उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। इसके पीछे चीन की भारी खरीदारी, सोलर उद्योग, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और फैक्ट्रियों में बढ़ता इस्तेमाल बड़ा कारण है। यही वजह है कि कई जानकार लंबी अवधि में चांदी को सोने से ज्यादा मजबूत मान रहे हैं।
सोना और चांदी का अनुपात भी इस समय एक बड़ा संकेत दे रहा है। यह अनुपात अभी करीब 59 के आसपास है। अगर यह 55 के नीचे जाता है तो चांदी में बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है।
कच्चे तेल का बाजार भी इस समय रुका हुआ दिखाई दे रहा है। दुनिया की नजर अमेरिका, ईरान और होर्मुज जलमार्ग की स्थिति पर बनी हुई है। आने वाले समय में तेल बाजार की दिशा काफी हद तक इन्हीं बातों से तय होगी।
तांबे में भी तेजी आई है, लेकिन बाजार में इसे लेकर बहुत ज्यादा चर्चा हो रही है कि तांबा खत्म हो जाएगा और भारी कमी आ जाएगी। हालांकि ऐसी बातें कई सालों से कही जाती रही हैं। सच यह है कि नई खदानें लगातार खोजी जाती हैं और आपूर्ति भी समय के साथ बढ़ती रहती है। इसलिए सिर्फ चर्चा सुनकर निवेश करना सही नहीं माना जाता।
अगर भारत के शेयर बाजार की बात करें तो यहां एक अलग तरह की चिंता दिखाई दे रही है। विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हैं। पिछले करीब 20 महीनों में 6 लाख करोड़ रुपये भारतीय बाजार से बाहर जा चुके हैं। यह पैसा अब ताइवान, कोरिया और ब्राज़ील जैसे देशों में जा रहा है।
ताइवान का बाजार अब भारत से बड़ा हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह AI और चिप बनाने वाली कंपनियों की ताकत है। टीएसएमसी जैसी कंपनियों का पूरी दुनिया के चिप बाजार पर बहुत बड़ा असर है। दूसरी तरफ भारत में नई तकनीक वाली कंपनियां अभी कम हैं और चिप उद्योग भी उतना मजबूत नहीं बन पाया है।
अगर विदेशी निवेशकों की बिकवाली ऐसे ही चलती रही, छोटे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ और म्यूचुअल फंडों में पैसा कम होता गया, तो भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में लोग फिर से एफडी जैसी सुरक्षित जगहों की तरफ लौट सकते हैं। और अगर ऐसा हुआ तो आने वाले वर्षों में निफ्टी के बहुत बड़े लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सोना फिलहाल थोड़े ठहराव के दौर में है, जबकि चांदी उससे ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है। दुनिया में अनिश्चितता अभी खत्म नहीं हुई है और आगे बाजार की दिशा काफी हद तक अमेरिका की नीतियों, ईरान-अमेरिका तनाव, डॉलर की चाल और चीन की मांग पर निर्भर करेगी।
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