आज दुनिया की नजर चार बड़े मुद्दों पर टिकी हुई है। पहला, ट्रंप के बदले हुए बयान और नए फेड चीफ केविन वॉर्स के कदम क्या संकेत दे रहे हैं। दूसरा, बढ़ता हुआ तेल संकट आने वाले 3 महीनों में वैश्विक इकॉनमी को कितना प्रभावित कर सकता है। तीसरा, “ईज़ी मनी” की नीति खत्म होने से गोल्ड और सिल्वर पर क्या असर पड़ेगा। और चौथा, भारतीय शेयर बाजार के लिए आई एक ऐसी बड़ी पॉजिटिव खबर, जो आगे बाजार की दिशा बदल सकती है। इन सभी मुद्दों के बीच दुनिया की इकॉनमी, शेयर बाजार और कमोडिटी मार्केट एक नए मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
फेड चीफ का कदम गोल्ड-सिल्वर के लिए घातक ….
सबसे पहले बात केविन वॉर्स की, जो नए फेड चीफ बनकर आए हैं और जिन पर पूरी दुनिया की नजर है। उनके हर कदम का असर सिर्फ अमेरिकी बाजार पर नहीं, बल्कि दुनिया भर के शेयर बाजार, गोल्ड और सिल्वर पर भी पड़ेगा। पहले माना जा रहा था कि केविन वॉर्स पूरी तरह ट्रंप की लाइन पर चलेंगे, क्योंकि ट्रंप लगातार फेड पर दबाव डालते रहे थे कि इंटरेस्ट रेट कम किया जाए। लेकिन अब ट्रंप ने अपना रुख थोड़ा बदल लिया है। उन्होंने कहा है कि फेड को स्वतंत्र रूप से वही करना चाहिए जो इकॉनमी के लिए सही हो।
असल में इस समय अमेरिका एक मुश्किल स्थिति में फंसा हुआ है। अगर इंटरेस्ट रेट बहुत तेजी से घटाया जाता है, तो महंगाई फिर से बढ़ सकती है। और अगर ज्यादा बढ़ाया जाता है, तो इकॉनमी पर भारी दबाव आ सकता है। इसलिए फेड के सामने सबसे बड़ी चुनौती बैलेंस बनाने की है। कोविड के बाद अमेरिका में जबरदस्त तरीके से पैसा छापा गया। ब्याज दरें लगभग शून्य के बराबर रखी गईं और बाजार में बहुत ज्यादा लिक्विडिटी आई। इसका असर यह हुआ कि महंगाई तेजी से बढ़ने लगी। अब जब महंगाई को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई गईं, तो पहले लिया गया सस्ता कर्ज महंगा हो गया। इससे कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता चला गया।
जब ट्रंप सत्ता में आए थे, तब अमेरिका का कर्ज लगभग 36 ट्रिलियन डॉलर था। अब यह बढ़कर 39–40 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंचता दिख रहा है। यानी सिर्फ एक साल में करीब 10% की बढ़ोतरी। ऐसी स्थिति में धीरे-धीरे डॉलर पर भरोसा भी कमजोर होने लगता है। हालांकि तेल संकट ने फिलहाल डॉलर को थोड़ी राहत दे दी है।
फिलहाल अमेरिका की इकॉनमी में स्लोडाउन के संकेत दिखाई दे रहे हैं। बॉन्ड मार्केट भी यही इशारा कर रहा है। 30 साल और 10 साल के बॉन्ड यील्ड तेजी से ऊपर गए थे। हालांकि अभी थोड़ी राहत आई है, लेकिन 30 साल वाला बॉन्ड अभी भी 5% के ऊपर और 10 साल वाला 4.5% के आसपास बना हुआ है। जब बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ती है, तो इसका मतलब होता है कि निवेशक भविष्य को लेकर चिंतित हैं और सिस्टम में रिस्क बढ़ रहा है।
अगर अगस्त तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद रहा, तो ऐसी तबाही…………
अब दूसरी बड़ी खबर तेल संकट को लेकर है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो अगस्त तक उनके तेल रिजर्व पर काफी दबाव आ जाएगा। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर हॉरमुज़ स्ट्रेट अगले 3 महीने तक इसी तरह प्रभावित रहा, तो दुनिया की इकॉनमी पर इसका बहुत बड़ा असर पड़ेगा। स्लोडाउन तेजी से बढ़ सकता है और रिसेशन का खतरा भी गहरा सकता है।
गोल्ड और सिल्वर
यहीं से गोल्ड और सिल्वर की कहानी शुरू होती है। एक तरफ फेड का सख्त रुख गोल्ड-सिल्वर पर दबाव डाल सकता है, वहीं दूसरी तरफ तेल संकट और इकॉनमिक स्लोडाउन इन दोनों धातुओं को मजबूती दे सकता है। इसलिए फिलहाल गोल्ड और सिल्वर दोनों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।
गोल्ड को इस समय सबसे बड़ा सपोर्ट सेंट्रल बैंकों की खरीदारी से मिल रहा है। वहीं सिल्वर को इंडस्ट्रियल डिमांड और सप्लाई की कमी सपोर्ट कर रही है। खासकर चीन लगातार सिल्वर खरीद रहा है। हांगकांग और सिंगापुर में फिजिकल गोल्ड-सिल्वर ट्रेडिंग का महत्व बढ़ रहा है। धीरे-धीरे बाजार पेपर ट्रेडिंग से हटकर फिजिकल ट्रेडिंग की तरफ जाता दिख रहा है। हालांकि इसमें समय लगेगा, लेकिन यह बदलाव लंबे समय में गोल्ड-सिल्वर के लिए काफी पॉजिटिव माना जा रहा है।
अगर सिल्वर की बात करें, तो अब ऐसा लग रहा है कि सिल्वर ने 70 डॉलर के आसपास अपना मजबूत बेस बना लिया है। पहले माना जाता था कि सिल्वर वापस 50 डॉलर तक जा सकता है, लेकिन पिछले कई महीनों में ऐसा नहीं दिखा। अब 70 से 80 डॉलर के बीच का जो कंसोलिडेशन है, वह सिल्वर को और मजबूत बना रहा है। अगर इसमें 10–15% की गिरावट भी आती है, तो उसे सामान्य गिरावट माना जाएगा, क्योंकि सिल्वर में उतार-चढ़ाव हमेशा ज्यादा रहता है।
कॉमेक्स में सिल्वर की उपलब्धता लगातार घट रही है, जबकि चीन में स्टॉक बढ़ रहा है। इसका मतलब साफ है कि फिजिकल डिमांड मजबूत बनी हुई है। यही कारण है कि बड़े बैंक, जो पहले आसानी से कीमतों को नीचे दबा देते थे, अब उतने सफल नहीं हो पा रहे हैं। कुल मिलाकर सिल्वर का स्ट्रक्चर बदल चुका है।
गोल्ड की बात करें, तो फिलहाल यह काफी हद तक फेड की अगली चाल और डॉलर इंडेक्स पर निर्भर करेगा। अगर फेड सख्त रुख अपनाता है, तो गोल्ड में दबाव आ सकता है। लेकिन लंबी अवधि में गोल्ड मजबूत दिख रहा है, क्योंकि जब भी इकॉनमी पर दबाव बढ़ता है और करेंसी पर भरोसा कमजोर होता है, तब गोल्ड और सिल्वर वैकल्पिक मौद्रिक सुरक्षा के रूप में उभरते हैं।
भारतीय शेयर बाजार
अब बात करते हैं भारतीय शेयर बाजार की। तेल संकट की वजह से भारत पर भी दबाव बढ़ रहा है,क्योंकि महंगा तेल इकॉनमी पर असर डालता है। लेकिन इसी बीच एक बड़ी पॉजिटिव खबर आई है। RBI ने सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड देने का फैसला किया है। यह पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा है। अगर सरकार इस पैसे का इस्तेमाल कैपेक्स यानी इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास कार्यों में करती है, तो इकॉनमी को बड़ा सपोर्ट मिल सकता है और जो स्लोडाउन की चिंता बन रही थी, उसे काफी हद तक रोका जा सकता है। यही वजह है कि यह खबर शेयर बाजार के लिए काफी पॉजिटिव मानी जा रही है। इसके अलावा अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो भारत दौरे पर हैं। इस दौरान भारत-अमेरिका संबंधों और ऊर्जा सहयोग पर भी चर्चा होगी। अगर अमेरिका की तरफ से सस्ता तेल और गैस उपलब्ध होती है, तो यह भारत के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है।
फिलहाल भारतीय बाजार में दबाव और पॉजिटिव संकेत,दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। कुल मिलाकर, आने वाले समय में बाजार, गोल्ड और सिल्वर,तीनों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। लेकिन लंबी अवधि के नजरिए से गोल्ड और सिल्वर अभी भी मजबूत दिखाई दे रहे हैं, जबकि भारतीय बाजार के लिए RBI का डिविडेंड और सरकारी कैपेक्स बड़ा सपोर्ट बन सकता है।
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