
बीजेपी ने राज्य में सामाजिक संतुलन बनाने के लिए कई प्रमुख नेताओं को अलग-अलग वर्गों की जिम्मेदारी सौंपी है। केवल सिंह ढिल्लों, रवनीत सिंह बिट्टू, कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़, अश्वनी शर्मा, तरुण चुघ और विजय सांपला जैसे नेताओं को अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है।
चंडीगढ़: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपनी राजनीतिक रणनीति को नया स्वरूप देना शुरू कर दिया है। पार्टी अब केवल पारंपरिक शहरी वोट बैंक तक सीमित रहने के बजाय हिंदू, सिख, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे चार प्रमुख सामाजिक वर्गों तक अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू हाल के दिनों में पंजाब में उग्रवाद के दौर और उससे जुड़े मुद्दों पर लगातार मुखर हैं। पार्टी इसे अपने व्यापक जनसंपर्क अभियान का हिस्सा मान रही है। वहीं, भाजपा का संगठनात्मक फोकस बूथ और सब-बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर है। पार्टी ने 620 ब्लॉक, 38 सेल और छह मोर्चों के माध्यम से हर वर्ग तक पहुंचने की रणनीति बनाई है।
बीजेपी ने राज्य में सामाजिक संतुलन बनाने के लिए कई प्रमुख नेताओं को अलग-अलग वर्गों की जिम्मेदारी सौंपी है। केवल सिंह ढिल्लों, रवनीत सिंह बिट्टू, कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़, अश्वनी शर्मा, तरुण चुघ और विजय सांपला जैसे नेताओं को अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के जरिए अपनी पुरानी ‘शहरी-हिंदू’ छवि से बाहर निकलकर राज्य के व्यापक सामाजिक आधार में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जालंधर स्थित डेरा सचखंड बल्लान का दौरा और डेरा प्रमुख संत निरंजन दास को पद्मश्री सम्मान दिए जाने को भी महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति केवल नए वोटरों को जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के खिलाफ संभावित एंटी-इनकंबेंसी का लाभ उठाने और विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने पर भी केंद्रित है। पार्टी संगठन का मानना है कि इससे स्थानीय स्तर पर उसकी पकड़ मजबूत होगी।
हालांकि राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंजाब की सामाजिक संरचना अन्य राज्यों से अलग है। यहां हिंदू, सिख और दलित समुदायों के भीतर भी कई सामाजिक और धार्मिक विविधताएं हैं, जिससे किसी एक राजनीतिक रणनीति के जरिए सभी वर्गों को एकजुट करना आसान नहीं होगा। ग्रामीण इलाकों में किसानों से जुड़े मुद्दे और किसान संगठनों का प्रभाव भी बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती बना रह सकता है।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि भविष्य में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच किसी तरह का चुनावी तालमेल बनता है, तो पंजाब की चुनावी राजनीति में नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने संगठन के विस्तार, सामाजिक आधार को मजबूत करने और नए राजनीतिक समीकरण बनाने पर पूरी तरह फोकस करती दिखाई दे रही है।



