चंद्रेश्वर भूतनाथ: गोवा की चोटी पर छिपा 1600 साल पुराना खगोलीय रहस्य

इस मंदिर की सबसे बड़ी पहेली इसका खगोलीय संरेखण है. प्राचीन शिल्पकारों ने गर्भगृह का निर्माण इस सूक्ष्म गणना से किया था कि हर पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की किरणें सीधे शिवलिंग का अभिषेक करती हैं. स्थानीय मान्यताओं और शोधकर्ताओं के अनुसार, चांदनी के स्पर्श मात्र से शिवलिंग से पानी की बूंदें रिसने लगती हैं.

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पणजी/पारोडा: गोवा का नाम आते ही जेहन में समंदर के किनारे और शोर-शराबे वाली पार्टियां कौंध जाती हैं, लेकिन दक्षिण गोवा के पारोडा की पहाड़ियों पर एक ऐसा रहस्य छिपा है जो आधुनिक विज्ञान और प्राचीन आस्था के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है. समुद्र तल से 350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान का एक विस्मयकारी प्रमाण है.

भोज राजवंश की विरासत और ‘चंद्रपुर’ का वैभव

इस मंदिर का इतिहास पुर्तगालियों के आगमन से लगभग एक हजार साल पहले का है. तीसरी से छठी शताब्दी के बीच यहां भोज राजवंश का शासन था. राजा देवराज गोमिनम के काल का ताम्रपत्र इस बात की तस्दीक करता है कि गोवा का यह क्षेत्र प्राचीन काल में व्यापार और संस्कृति का केंद्र था. उस समय की राजधानी ‘चंद्रपुर’ (वर्तमान चंदर) का नामकरण ही इनके आराध्य देवता भगवान चंद्रेश्वर के नाम पर किया गया था. कुशावती नदी के मार्ग से उस दौर में अरब देशों तक व्यापारिक जहाज जाया करते थे.

खगोलीय चमत्कार: जब चांदनी से बात करता है शिवलिंग

इस मंदिर की सबसे बड़ी पहेली इसका खगोलीय संरेखण (Astronomical Alignment) है. प्राचीन शिल्पकारों ने गर्भगृह का निर्माण इस सूक्ष्म गणना से किया था कि हर पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की किरणें सीधे शिवलिंग का अभिषेक करती हैं. स्थानीय मान्यताओं और शोधकर्ताओं के अनुसार, चांदनी के स्पर्श मात्र से शिवलिंग से पानी की बूंदें रिसने लगती हैं. हालांकि, आधुनिक निर्माण कार्यों और मंदिर के मंडप विस्तार के कारण अब यह दुर्लभ दृश्य केवल चैत्र पूर्णिमा जैसी विशेष तिथियों पर ही स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

क्या शिवलिंग वास्तव में एक उल्कापिंड है?

गोवा विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की एक थ्योरी इस रहस्य को और गहरा कर देती है. शोध के अनुसार, प्राचीन काल में चंद्रनाथ पर्वत के आसपास एक विशाल उल्कापिंड टकराया था. इसके प्रमाण के रूप में आसपास के इलाकों में कांच जैसे गोल पत्थर (Tektites) मिले हैं, जो अत्यधिक गर्मी और दबाव में मिट्टी के पिघलने से बनते हैं. स्थानीय लोग सदियों से यहां मिलने वाले विशेष पत्थरों को नक्षत्रों के पत्थर कहकर पूजते आए हैं. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहां का स्वयंभू शिवलिंग वास्तव में एक स्टोनी-आयरन उल्कापिंड (Stony-iron Meteorite) हो सकता है, जिसकी खनिज संरचना तापमान या चांदनी के संपर्क में आने पर नमी उत्सर्जित करती है.

वास्तुकला और अनूठी परंपराएं

मंदिर परिसर में चंद्रेश्वर के साथ ही उनके रक्षक भगवान भूतनाथ का मंदिर है. दोनों मंदिरों के बीच एक विशेष झरोखा बनाया गया है, ताकि दोनों देवता सदैव एक-दूसरे के सम्मुख रहें. मंदिर का प्रबंधन आज भी प्राचीन वनगोड प्रणाली से चलता है, जिसमें आठ गांवों के प्रतिनिधि सामूहिक रूप से व्यवस्था संभालते हैं. इसके अलावा, यहां पाए जाने वाले दुर्लभ छोटे चट्टानी केकड़े इस पहाड़ के विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र को और भी रहस्यमयी बनाते हैं. पारोडा का चंद्रेश्वर मंदिर याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों के पास ग्रहों की गति और भू-गर्भ विज्ञान की वह समझ थी जिसे हम आज के उन्नत उपकरणों से फिर से समझने की कोशिश कर रहे हैं. यह स्थान गोवा के उस गौरवशाली इतिहास का जीवित गवाह है, जो सदियों से बादलों और चांदनी के बीच मौन खड़ा है.

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