एक धड़, दो रूप! जानिए कैसे कटी हुई गर्दन से प्रकट हुईं माहूर की रेणुका देवी और माता यल्लम्मा?

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महाराष्ट्र: नांदेड़ जिले में स्थित माहूर (माहुरगढ़) का श्री रेणुका माता मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है. हर साल लाखों श्रद्धालु यहां मां रेणुका का आशीर्वाद लेने आते हैं. देवी रेणुका को भगवान परशुराम की माता और माहुर की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. मां रेणुका देवी से जुड़ी कई मुख्य पौराणिक कथाएं प्रचलित है, जो इस जगह को और ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है.

जल, बालू का घड़ा और पतिव्रता शक्ति

बेहद प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, देवी रेणुका एक राजकुमारी थीं, जिनका विवाह महान एवं तपस्वी महर्षि जमदग्नि से हुआ था. उनके पांच पुत्र थे, जिनमें से सबसे छोटे भगवान परशुराम थे, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं. मां रेणुका का अपने पति के प्रति इतना अगाध पतिव्रत धर्म और भक्ति थी कि उन्हें एक अद्भुत सिद्धि प्राप्त थी. वे प्रतिदिन नदी तट पर जाकर बालू से नया घड़ा बनाती थीं और एक जीवित सांप को मोड़कर सिर पर चकरी की तरह रखकर, उस बालू के घड़े में जल भरकर अपने पति की पूजा के लिए लाती थीं.

सिद्धि का लुप्त होना

एक दिन नदी पर जल लेने जाते समय, उन्होंने जल में एक गंधर्व का प्रतिबिंब देखा और क्षण भर के लिए उनका मन उसकी सुंदरता से आकर्षित हो गया. इस क्षणिक विचलन के कारण उनकी वह अलौकिक शक्ति समाप्त हो गई और वे बालू का घड़ा नहीं बना पाईं. जब वे खाली हाथ लौटीं, तो महर्षि जमदग्नि को अपने योगबल से सब ज्ञात हो गया. वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने देवी रेणुका को आश्रम से बाहर कर दिया.

परशुराम द्वारा आज्ञा पालन और पुनर्जीवन

इसके बाद भी ऋषि जमदग्नि का क्रोध शआंत नहीं हुआ उन्होंने अपने बेटों को मां का वध करने करने का आदेश दिया, लेकिन उनके बड़े पुत्रों ने अपनी माता का वध करने की पिता की आज्ञा को मानने से इंकार कर दिया. इससे कुपित होकर ऋषि ने उन्हें भस्म कर दिया. तभी वहां परशुराम पहुंचे. अपने पिता की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म मानते हुए, उन्होंने अपने परशु से अपनी माता का सिर धड़ से अलग कर दिया. परशुराम की इस अटूट पितृ-भक्ति से प्रसन्न होकर महर्षि जमदग्नि ने उनसे वरदान मांगने को कहा. तब परशुराम ने माता और सभी भाइयों को पुनः जीवित करने का वरदान मांग लिया. महर्षि ने यह वरदान स्वीकार किया और माता रेणुका और उनके पुत्र पुनः जीवित हो उठे. तत्पश्चात, माता रेणुका की दिव्य चेतना का विस्तार हुआ और वे माहूर के पर्वत पर जगदम्बा देवी के रूप में स्थापित हुईं.

माता यल्लम्मा (Yellamma) की लोककथा

एक अन्य प्रचलित लोककथा के अनुसार, जब परशुराम माता का पीछा कर रहे थे, तब रेणुका माता एक स्थानीय बस्ती में शरण लेने गईं. वहां एक महिला ने माता रेणुका को बचाने का प्रयास किया, लेकिन परशुराम के प्रहार से माता रेणुका और उस महिला, दोनों का सिर कट गया.जब उन्हें जीवित किया गया, तो गलती से माता रेणुका का धड़ उस महिला के सिर से और उस महिला का धड़ माता रेणुका के सिर से जुड़ गया. महर्षि जमदग्नि ने माता रेणुका के धड़ वाले रूप को स्वीकार किया, जबकि सिर वाले रूप को दक्षिण भारत और लोक-संस्कृति में देवी यल्लम्मा के रूप में पूजा जाने लगा.

सहस्त्रार्जुन का वध और माहूर में माता की स्थापना

एक अन्य कथा के अनुसार, दुष्ट राजा सहस्त्रार्जुन ने महर्षि जमदग्नि की अलौकिक कामधेनु गाय को छीनने के लिए आश्रम पर आक्रमण किया और महर्षि की हत्या कर दी. पति के वियोग में माता रेणुका ने भी अपने प्राण त्याग दिए.जब भगवान परशुराम को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने प्रतिज्ञा ली और सहस्त्रार्जुन का वध कर पृथ्वी को अत्याचारी राजाओं से मुक्त किया.कहा जाता है कि जब भगवान दत्तात्रेय ने महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका को पुनः जीवन प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की, तब परशुराम ने उत्सुकतावश पीछे मुड़कर देख लिया. इस कारण माता रेणुका का केवल मुख (सिर) ही पृथ्वी से बाहर प्रकट हो सका. वही पावन मुख रूप आज माहुरगड में श्री रेणुका देवी के रूप में स्थापित है और श्रद्धालुओं का कल्याण कर रहा है.

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