जंजीरों का सहारा और 200 फीट गहरी खाई: अरावली की कंदराओं में बसे ‘तिलकेश्वर महादेव’ जहां से कोई खाली हाथ नहीं आता!

उदयपुर में एक ऐसा शिवधाम है जहां दर्शन पाने के लिए भक्तों को अपनी जान हथेली पर रखनी पड़ती है. अरावली की दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित 'तिलकेश्वर महादेव' की भक्ति जितनी कठिन है, उतनी ही रोमांचक भी.

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राजस्थान के उदयपुर में एक ऐसा शिवधाम है जहां दर्शन पाने के लिए भक्तों को अपनी जान हथेली पर रखनी पड़ती है. अरावली की दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित ‘तिलकेश्वर महादेव’ की भक्ति जितनी कठिन है, उतनी ही रोमांचक भी. उदयपुर जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर और गोगुंदा तहसील से 45 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच यह चमत्कारी स्थान स्थित है. यहां महादेव किसी भव्य भवन में नहीं, बल्कि ज़मीन से करीब 200 फीट नीचे एक प्राकृतिक गुफा में विराजमान हैं.

डर पर भारी पड़ती अटूट आस्था

इस रहस्यमयी गुफा तक पहुंचने का रास्ता बेहद रोंगटे खड़े कर देने वाला है. यहां न तो कोई पक्की सीढ़ियां हैं और न ही प्रशासन की ओर से कोई सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम है. श्रद्धालुओं के पास नीचे उतरने का एकमात्र सहारा लोहे की मोटी जंजीरें हैं. इन जंजीरों को मजबूती से थामकर, खड़ी और फिसलन भरी चट्टानों के बीच से होकर शिवभक्त एक-एक कदम फूंक-फूंक कर नीचे खाई में रखते हैं. खाई पार करने के बाद भी परीक्षा खत्म नहीं होती. इसके बाद गुफा के बेहद संकरे रास्तों और प्राकृतिक पत्थरों से होकर मुख्य शिवलिंग तक पहुंचना होता है. यहां आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि जब वे जंजीर पकड़कर नीचे उतरते हैं, तो शुरुआत में डर ज़रूर लगता है, लेकिन हर-हर महादेव के जयकारों के साथ वह डर पल भर में गायब हो जाता है.

पंचामृत नहीं, ‘काले तिल’ से प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ

तिलकेश्वर महादेव मंदिर की पूजा पद्धति भी अन्य शिव मंदिरों से काफी जुदा है. आमतौर पर जहां शिवजी का अभिषेक पंचामृत से होता है, वहीं यहां महादेव को काले तिल, ताजे गुलाब के फूल, दूध और शुद्ध जल अर्पित किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त यहां आकर सच्चे मन से एक मुट्ठी काले तिल चढ़ाता है, भोलेनाथ उसकी झोली कभी खाली नहीं रखते और उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भूमनु के पुत्र राजा तिलक ने अपनी प्रजा के कल्याण, सुख और समृद्धि के लिए इसी निर्जन गुफा में वर्षों तक कठोर तपस्या की थी. उन्होंने काले तिलों से भगवान आशुतोष का अभिषेक कर उन्हें प्रसन्न किया था. राजा तिलक के नाम पर ही इस स्वयंभू शिवलिंग का नाम तिलकेश्वर महादेव पड़ा.

प्रकृति और अध्यात्म का अनूठा संगम

सावन के मौसम में यह पूरा इलाका मानो मखमली हरी चादर ओढ़ लेता है. अरावली की वादियों की शांति, चारों ओर बहते झरनों का शोर और रिमझिम फुहारों के बीच इस दुर्गम यात्रा का रोमांच दोगुना हो जाता है. यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि एडवेंचर के शौकीनों के लिए भी एक बेहतरीन अनुभव है. अगर आप भी इस सावन किसी ऐसी आध्यात्मिक यात्रा पर जाना चाहते हैं जो आपके साहस और भक्ति दोनों की परीक्षा ले, तो उदयपुर के तिलकेश्वर महादेव का रुख कर सकते हैं. बस ध्यान रहे, यहां कदम रखने से पहले आपको मजबूत इरादों और गहरी आस्था की जंजीर को थामना होगा.

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