बलूचिस्तान का ‘रहस्यमयी’ हिंगलाज मंदिर: जिसे हिंदू कहते हैं ‘शक्तिपीठ’, मुसलमान बुलाते हैं ‘नानी का हज’

जिस मजहब में मूर्ति पूजा वर्जित है, उसी मजहब के बलोच और ज़िक्री मुसलमान सदियों से इस मंदिर की सुरक्षा और व्यवस्था संभाल रहे हैं. वे मंदिर में लाल कपड़ा, अगरबत्ती और मीठी सिरनी प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं.

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पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत में एक ऐसा स्थान है जहां मजहब की दीवारें ढह जाती हैं. हिंगोल नेशनल पार्क के ऊबड़-खाबड़ और बंजर पहाड़ों के बीच स्थित हिंगलाज माता मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह हिंदू-मुस्लिम एकता की एक अद्भुत मिसाल भी है. यह जगह सदियों से नफरत के माहौल के बीच प्रेम और विश्वास का सेतु बनी हुई है.

क्या है हिंगलाज मंदिर का महत्व?

हिंदू धर्म में, यह स्थान माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां माता सती का ब्रह्मरंध्र (मस्तिष्क का ऊपरी भाग) गिरा था. वहीं, स्थानीय मुसलमान इसे नानी का मंदिर और इस कठिन यात्रा को नानी का हज कहते हैं.

रामायण और मेसोपोटामिया से जुड़ा इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर के तार हज़ारों साल पुरानी सभ्यताओं से जुड़े हैं. माना जाता है कि प्राचीन मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक-सीरिया) की देवी नाना की पूजा ही कालांतर में यहां बीबी नानी के रूप में विकसित हुई. वहीं, हिंदू मान्यताओं के अनुसार, रावण वध के बाद ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी यहां आए थे. आज भी वहां तीरकुंड और ब्रह्मकुंड मौजूद हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे लक्ष्मण जी के बाण से निकले थे. इसके अलावा, गुरु नानक देव और सूफी संत शाह अब्दुल लतीफ भिट्टाई का भी इस स्थान से गहरा जुड़ाव रहा है.

पापकर्मों की ‘अग्निपरीक्षा’

यहां दर्शन के रास्ते में ‘बाबा चंद्रगुप्त’ नामक एक सक्रिय मिट्टी का ज्वालामुखी है, जिसे भगवान शिव का रूप माना जाता है. भक्त यहां जाने से पहले एक अनोखी रस्म निभाते हैं. ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़े होकर श्रद्धालुओं को अपने जीवन के पाप सबके सामने चिल्लाकर स्वीकार करने पड़ते हैं. माना जाता है कि यदि कीचड़ में हलचल होती है, तो देवी ने पाप क्षमा कर दिए. पहले यहां ‘चुल’ परंपरा के तहत भक्त जलते अंगारों पर चलकर भी अपनी मन्नत पूरी करते थे.

आस्था जो सरहदों की मोहताज नहीं

यह यात्रा इतनी दुर्गम है कि पुराने समय में इसकी तुलना अमरनाथ यात्रा से की जाती थी. 2004 में मकरान तटीय राजमार्ग बनने के बाद यह सफर कुछ आसान हुआ है. आज यह भारत और नेपाल के बाहर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हिंदू उत्सव बन चुका है. हाल ही में 17 से 19 अप्रैल 2026 के बीच आयोजित तीन दिवसीय वार्षिक उत्सव में लगभग 3 लाख श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया. पूरे साल में यहां आने वालों की संख्या 10 लाख तक पहुंच जाती है.

सौहार्द की मिसाल

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस मजहब में मूर्ति पूजा वर्जित है, उसी मजहब के बलोच और ज़िक्री मुसलमान सदियों से इस मंदिर की सुरक्षा और व्यवस्था संभाल रहे हैं. वे मंदिर में लाल कपड़ा, अगरबत्ती और मीठी सिरनी प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं. आज पाकिस्तानी सेना, फ्रंटियर कॉर्प्स और स्थानीय प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था संभालते हैं, जबकि स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग इसे अपनी संस्कृति का अटूट हिस्सा मानते हैं. बलूचिस्तान के तपते रेगिस्तान में गूंजती शंख की ध्वनि और नानी की जय के नारे यह साबित करते हैं कि इंसानियत, धर्म और राजनीति की तमाम सीमाओं से कहीं ऊपर है। इसके अलावा हिंगलाज माता के दर्शन करने के लिए भक्तों को विशेष छड़ीदार के साथ यात्रा करनी पड़ती है और रेगिस्तान में पानी साझा न करना भी एक कठिन तपस्या का हिस्सा माना जाता है?

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