खिद्रापुर का कोपेश्वर मंदिर: 48 खंभों पर टिका स्वर्ग मंडप, शिव के क्रोध की अनसुनी कहानी

जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह के बाद महादेव प्रचंड क्रोध (कोप) में थे. कहा जाता है कि सती अपने पिता के घर नंदी पर सवार होकर गई थीं, इसी वियोग और क्रोध के कारण यहां महादेव के साथ नंदी नहीं हैं.

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खिद्रापुर (कोल्हापुर): महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा पर कृष्णा नदी के तट पर बसा खिद्रापुर गांव आज भी भारत के उस स्वर्ण युग की गवाही देता है, जब पत्थर बोले जाते थे और वास्तुकला में विज्ञान समाहित था. यहां स्थित कोपेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के खगोल शास्त्र और इंजीनियरिंग का एक जीवंत दस्तावेज है.

महादेव का ‘कोप’ और नंदी की अनुपस्थिति

सामान्यतः हर शिव मंदिर के द्वार पर नंदी की प्रतिमा अनिवार्य होती है, लेकिन कोपेश्वर मंदिर पूरे भारत में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जहां नंदी महाराज अनुपस्थित हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर उस समय का प्रतीक है जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह के बाद महादेव प्रचंड क्रोध (कोप) में थे. कहा जाता है कि सती अपने पिता के घर नंदी पर सवार होकर गई थीं, इसी वियोग और क्रोध के कारण यहां महादेव के साथ नंदी नहीं हैं.

जब विष्णु बने शिवलिंग: कोपेश्वर और धोपेश्वर का संगम

मंदिर के गर्भगृह में एक और अनोखा दृश्य देखने को मिलता है. यहां एक नहीं, बल्कि दो शिवलिंग स्थापित हैं. मुख्य शिवलिंग ‘कोपेश्वर’ (क्रोधित शिव) का है, वहीं उनके ठीक बगल में दूसरा शिवलिंग ‘धोपेश्वर’ के रूप में है, जो स्वयं भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है. कहा जाता है कि महादेव के प्रचंड क्रोध को शांत करने के लिए श्री हरि विष्णु को स्वयं यहां लिंग रूप में विराजित होना पड़ा था.

स्वर्ग मंडप: छत से झांकता ब्रह्मांड

मंदिर का सबसे मुख्य आकर्षण इसका ‘स्वर्ग मंडप’ है. 48 नक्काशीदार स्तंभों पर टिका यह गोलाकार मंडप वास्तुकला का चमत्कार है. इसकी छत बीच में से 13 फीट के व्यास में पूरी तरह खुली है. प्राचीन समय में यहां यज्ञ किए जाते थे, ताकि उनकी आहुति का धुआं सीधे आकाश की ओर जा सके. इस मंडप की बनावट ऐसी है कि हर साल ‘कार्तिक पूर्णिमा’ की रात को चंद्रमा ठीक इस खुली छत के केंद्र में आता है, जिससे उसकी दूधिया रोशनी सीधे नीचे बनी रंगशिला पर गिरती है.

कला और इतिहास का संगम

7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच चालुक्य, शिलाहार और यादव राजवंशों द्वारा निर्मित इस मंदिर को महाराष्ट्र का खजुराहो भी कहा जाता है. मंदिर के आधार यानी गजथर पर 92 हाथियों की विशाल कतार उकेरी गई है, जो अपनी पीठ पर पूरे मंदिर का भार उठाए हुए प्रतीत होते हैं. विदेशी आक्रमणों के दौरान कई मूर्तियों को खंडित किया गया, लेकिन आज भी यहां की मदनिकाओं और सुरसुंदरियों की सुंदरता पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है. मई के महीने में जब सूर्य की किरणें सीधे शिवलिंग का अभिषेक करती हैं, तो आधुनिक वैज्ञानिक भी प्राचीन ऋषियों और शिल्पकारों के गणनात्मक ज्ञान के आगे नतमस्तक हो जाते हैं. यह मंदिर हमारी उस विरासत का हिस्सा है, जो हमें याद दिलाती है कि हमारे पूर्वज विज्ञान और भक्ति को एक ही धागे में पिरोना जानते थे.

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