कुमारी कंदम: क्या समुद्र की गहराइयों में दफन है कोई खोई हुई सभ्यता?

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भारतीय इतिहास की किताबों और आधुनिक विज्ञान के दावों के बीच एक ऐसी कहानी तैर रही है, जो करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। यह कहानी है— कुमारी कंदम की। तमिल साहित्य में वर्णित एक ऐसा विशाल महाद्वीप, जिसे द्रविड़ सभ्यता का ‘पालना’ माना जाता है, लेकिन जिसे आज से हजारों साल पहले समुद्र ने अपनी गोद में समेट लिया।

साहित्यिक साक्ष्य: तीन संगमों का गौरवशाली इतिहास

तमिल विद्वानों के अनुसार, कुमारी कंदम केवल एक मिथक नहीं, बल्कि एक गौरवशाली भौगोलिक सच्चाई है। 15वीं शताब्दी के ‘कंद पुराणम्’ और प्राचीन संगम काल की रचनाओं जैसे ‘शिलप्पादिकारम’ में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि पांड्य राजाओं के संरक्षण में यहाँ तीन महान साहित्यिक सभाएं (संगम) हुई थीं।पहला संगम ‘तेन मदुरै’ में हुआ जो 4,400 साल तक चला, जबकि दूसरा ‘कपाटपुरम’ में। इन दोनों ही नगरों को ‘कडल कोल’ यानी समुद्र के भीषण अतिक्रमण ने निगल लिया। आज का मदुरै शहर इसी तीसरे संगम की विरासत है, जो उत्तर की ओर विस्थापन के बाद बसाया गया।

लेमुरिया और कुमारी कंदम का कनेक्शन

19वीं सदी में इस कहानी में एक नया मोड़ तब आया, जब ब्रिटिश जूलॉजिस्ट फिलिप स्केलेटर ने ‘लेमुरिया’ नाम के एक लुप्त महाद्वीप की परिकल्पना की। उनका उद्देश्य भारत और मेडागास्कर के बीच लेमूर जीवाश्मों की समानता को समझाना था। तमिल विचारकों ने इस वैज्ञानिक थ्योरी को तुरंत कुमारी कंदम से जोड़ दिया। देवनेय पावनार जैसे विद्वानों ने दावा किया कि इसी भूमि पर आदिम मानव ने पहली बार तमिल भाषा का उच्चारण किया था।

क्या कहता है आधुनिक विज्ञान?

जहाँ प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) के सिद्धांत हिंद महासागर में किसी विशाल महाद्वीप के डूबने की बात को नकारते हैं, वहीं समुद्री भू-विज्ञान एक अलग ‘ट्विस्ट’ पेश करता है। शोध बताते हैं कि करीब 14,500 साल पहले अंतिम हिमयुग (Ice Age) के दौरान समुद्र का जलस्तर आज से 100 मीटर नीचे था।उस समय भारत और श्रीलंका आपस में जुड़े हुए थे और कन्याकुमारी के दक्षिण में लगभग 6,500 वर्ग किमी का भूभाग मौजूद था। जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघली, यह तटीय भूमि धीरे-धीरे समुद्र में समा गई। हाल के वर्षों में समुद्री पुरातत्वविदों को पुहार (कावेरीपूमपट्टनम) के तट पर पानी के नीचे प्राचीन संरचनाएं और घाट मिले हैं, जो संगम साहित्य के दावों को एक नया आधार देते हैं।

विरासत जो कभी नहीं डूबी

इतिहासकार सुमति रामास्वामी इसे तमिलों के उस सामूहिक दर्द का प्रतीक मानती हैं, जो विस्थापन से पैदा हुआ। कुमारी कंदम भले ही आज नक्शे पर न हो, लेकिन यह कहानी हमें याद दिलाती है कि मानव इतिहास की जड़ें समुद्र की गहराइयों से भी कहीं अधिक गहरी हैं। यह एक ऐसी सभ्यता की कहानी है जिसने अपनी ज़मीन तो खो दी, लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति को कभी डूबने नहीं दिया।

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