कैसे बना 80 टन के पत्थर वाला बृहदेश्वर मंदिर? दोपहर में गायब हो जाती है परछाई!

बिना नींव और सीमेंट के बना 1000 साल पुराना ये मंदिर आज भी विज्ञान के लिए एक पहेली है. तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर के अनसुलझे रहस्य आज भी वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर करते हैं.

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BRIHDESHWAR TEMPLE

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बिना किसी नींव के 216 फीट ऊंची गगनचुंबी इमारत खड़ी की जा सकती है? एक ऐसी संरचना जिसका कुल वजन 1 लाख 30 हजार टन है, लेकिन वह सदियों से अडिग है. हम बात कर रहे हैं तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर की. राजा राज चोल द्वारा निर्मित यह मंदिर केवल भक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का वो शिखर है जिसे आज का आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह समझने में नाकाम रहा है.

बिना नींव और बिना सीमेंट का चमत्कार

इस मंदिर की सबसे पहली और हैरान करने वाली विशेषता यह है कि इसकी कोई गहरी नींव नहीं है. इसे जमीन के ऊपर ही पत्थरों को एक-दूसरे में इंटरलॉक करके बनाया गया है. हैरानी की बात यह है कि इस पूरे निर्माण में न तो सीमेंट का उपयोग हुआ है और न ही चूने या किसी अन्य जोड़ने वाले पदार्थ का. इसे एक पजल की तरह जोड़ा गया है. ग्रेनाइट के भारी-भरकम पत्थरों के बीच का जोड़ इतना सटीक है कि आज एक हजार साल बाद भी उनके बीच एक महीन सुई तक नहीं जा सकती.

80 टन का ‘कुंभम’ शिखर पर रखा रहस्य

मंदिर के मुख्य शिखर के ऊपर एक विशाल पत्थर रखा है, जिसे ‘कुंभम’ कहा जाता है. इस अकेले पत्थर का वजन लगभग 80,000 किलो है. 11वीं शताब्दी में, जब कोई क्रेन या लिफ्ट नहीं थी, तब 216 फीट की ऊंचाई पर इतना भारी पत्थर कैसे पहुंचाया गया? इतिहासकारों के अनुसार, चोल इंजीनियरों ने मंदिर से 6 किलोमीटर दूर एक गांव से मिट्टी का एक ढलान बनाया था. हजारों हाथियों और मजदूरों की मदद से इस पत्थर को धीरे-धीरे शिखर तक धकेला गया. यह निर्माण कला के इतिहास का सबसे बड़ा कंस्ट्रक्शन रैंप माना जाता है.

दोपहर में गायब हो जाती है परछाई?

बृहदेश्वर मंदिर का एक और अनसुलझा रहस्य इसकी परछाई से जुड़ा है. दोपहर के 12 बजे, जब सूरज ठीक ऊपर होता है, तब इस विशाल मुख्य शिखर की परछाई जमीन पर दिखाई नहीं देती. यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि गणित और ज्यामिति का उत्कृष्ट उदाहरण है. चोल शिल्पकारों ने मंदिर के आधार और शिखर के अनुपात को इतनी बारीकी से डिजाइन किया था कि परछाई खुद मंदिर के आधार के भीतर ही सिमट जाती है.

ध्वनि विज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा

यह मंदिर केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए भी है. मंदिर का गर्भगृह ठोस ग्रेनाइट से बना है. जब यहां मंत्रोच्चार होता है, तो पूरा मंदिर एक विशेष फ्रीक्वेंसी पर कंपन करता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी ध्वनि तरंगों को इस तरह मोड़ती है कि वहां मौजूद व्यक्ति का मस्तिष्क शांत हो जाता है और उसे अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है.

गौरवशाली भारतीय विरासत

1000 सालों में इस मंदिर ने कई भीषण भूकंप, प्राकृतिक आपदाएं और विदेशी आक्रमण झेले, लेकिन राजराजेश्वरम जिसे बृहदेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है आज भी मजबूती से खड़ा है. यह मंदिर उस समय का प्रमाण है जब भारत वास्तुकला और विज्ञान में दुनिया का नेतृत्व कर रहा था. बृहदेश्वर मंदिर हमारे पूर्वजों के उस असीम ज्ञान की याद दिलाता है जिसे आने वाली पीढ़ियां हमेशा गर्व के साथ याद रखेंगी.

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