अगर इंसाफ मिल चुका था…तो सड़कों पर ये आग फिर क्यों जल रही है?अगर कातिल जेल में हैं…तो जनता अब भी किसे ढूंढ रही है?उत्तराखंड… पहाड़ों की शांति के लिए जाना जाने वाला राज्य…लेकिन इस बार सड़कों पर सन्नाटा नहीं, बल्कि सवाल हैं… नारे हैं… और एक नाम है — अंकिता भंडारी!
20 दिन की नौकरी… और एक ज़िंदगी का अंत
अंकिता भंडारी।
उम्र सिर्फ 20 साल।
ऋषिकेश के पास वनंत्रा रिज़ॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट।
न कोई राजनीतिक ताकत, न कोई पहचान।
18 सितंबर 2022 की रात —
अंकिता अचानक लापता हो जाती है।
छह दिन बाद, 24 सितंबर को उसका शव बरामद होता है।
देश उबल पड़ता है।
रिज़ॉर्ट में आग लगती है।
सरकार और सिस्टम सवालों के घेरे में आ जाते हैं।
जांच में तीन नाम सामने आते हैं —
पुलकित आर्य, अंकित गुप्ता और सौरभ भास्कर।
कोर्ट का फैसला: उम्रकैद… और देश ने कहा – “इंसाफ हुआ”
करीब 3 साल 4 महीने बाद,
मई 2025 में कोर्ट का फैसला आता है।
तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सज़ा।
देश ने राहत की सांस ली।
लगा कि अब मामला खत्म हो गया।
लेकिन…
कभी-कभी सज़ा मिल जाती है,
पर सच दफन रह जाता है।
एक वीडियो… जिसने पूरी कहानी पलट दी
29 दिसंबर।
न कोई FIR।
न कोई कोर्ट बयान।
बस सोशल मीडिया पर एक वीडियो।
एक महिला सामने आती है —
नाम: उर्मिला सनावर।
वो दावा करती है कि
“अंकिता की हत्या इसलिए हुई क्योंकि उसने एक वीवीआईपी को ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने से इनकार कर दिया था।”
यहीं से कहानी फिर सुलगने लगती है।
ऑडियो क्लिप और VIP का नाम… जो लिया नहीं जा सकता
वीडियो के बाद एक ऑडियो क्लिप सामने आती है।
दो आवाज़ें —
एक उर्मिला की,
दूसरी बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की।
ऑडियो में कथित तौर पर हत्या के असली कारण और उस वीवीआईपी नेता का ज़िक्र किया जाता है।
लेकिन…
आप वो नाम नहीं सुन पाएंगे।
क्यों?
क्योंकि जैसे ही मामला सामने आता है —
वो वीवीआईपी नेता दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच जाता है।
7 जनवरी: कोर्ट की रोक और बढ़ता शक
7 जनवरी को कोर्ट का आदेश आता है —
मीडिया उस नेता का नाम नहीं ले सकता।
यहीं से जनता का शक गहराता है।
लोग पूछ रहे हैं:
- अगर सब कुछ साफ था, तो नाम पर रोक क्यों?
- अगर वीवीआईपी निर्दोष है, तो जांच से डर क्यों?
- अगर हत्या सिर्फ तीन लोगों ने की, तो VIP एंगल बार-बार क्यों उभर रहा है?
सिर्फ विपक्ष नहीं, सत्ता के भीतर भी सवाल
यह मामला अब सिर्फ विपक्ष का नहीं रह गया।
बीजेपी के अंदर से भी आवाज़ें उठ रही हैं।
खुद पार्टी के नेता दोबारा जांच की मांग कर रहे हैं।
अंकिता के पिता खुले तौर पर कह रहे हैं —
“हमें CBI जांच चाहिए।”
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान आता है —
“वो वीवीआईपी नेता 10 से 20 सितंबर के बीच उत्तराखंड में नहीं था।”
पुलिस कहती है —
पहले की SIT ने VIP एंगल जांचा,
कोई सबूत नहीं मिला।
लेकिन जनता पूछती है —
अगर सबूत नहीं थे,
तो नई शिकायतों की जांच से डर क्यों?
नई SIT, नई पूछताछ… लेकिन पुराना सवाल
अब एक बार फिर SIT बनाई गई है।
उर्मिला सनावर से पूछताछ हो चुकी है।
उर्मिला का दावा है —
- ऑडियो 1 नवंबर 2025 को रिकॉर्ड हुआ
- सच सामने आने के बाद जान को खतरा है
- मोबाइल गायब किया जा सकता है
लेकिन सवाल अब भी कायम है।
ये लड़ाई सज़ा की नहीं… सच की है
ये लड़ाई इस बात की नहीं है कि
पुलकित आर्य दोषी है या नहीं।
ये लड़ाई है:
- क्या किसी और ने हत्या का आदेश दिया?
- क्या कोई ताकतवर आज भी कानून से ऊपर है?
- क्या एक लड़की की मौत की पूरी कहानी देश को बताई गई?
अंकिता सिर्फ एक नाम नहीं है।
वो सिस्टम का आईना है।
अगर आज सवाल नहीं पूछे गए,
तो कल कोई और अंकिता होगी।
इंसाफ सिर्फ सज़ा नहीं होता… इंसाफ सच होता है
उत्तराखंड आज यही पूछ रहा है —
“हमें सज़ा नहीं… पूरा सच चाहिए।”




